रायपुर, 26 अप्रैल, 2026:
छत्तीसगढ़ के हृदय स्थल बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में स्थित 245 वर्ग किलोमीटर में फैला ‘बारनवापारा वन्यजीव अभयारण्य’ आज संरक्षण की सफलता की एक मूक लेकिन सशक्त मिसाल बन गया है। एक समय ऐसा था जब इस क्षेत्र से ये सुंदर जीव पूरी तरह गायब हो चुके थे, लेकिन आज यहाँ धैर्य, वैज्ञानिक देखभाल और पारिस्थितिक प्रतिबद्धता के कारण लगभग 200 कृष्णमृग (ब्लैकबक) स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं।

बारनवापारा के खुले घास के मैदानों में कुलाचें भरते इन कृष्णमृगों को देखना न केवल सुखद है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि दशकों की अनुपस्थिति के बाद भी प्रकृति का पुनरुद्धार संभव है।

प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ में दी राष्ट्रीय पहचान
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने रविवार को कहा कि यह बड़े गर्व का विषय है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के ताजा अंक में छत्तीसगढ़ के कृष्णमृग संरक्षण प्रयासों की सराहना की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस राष्ट्रीय पहचान से न केवल छत्तीसगढ़ की छवि मजबूत हुई है, बल्कि जमीनी स्तर पर संरक्षण कार्य में लगे लोगों का मनोबल भी बढ़ा है। इस उल्लेख ने बारनवापारा को देश के संरक्षण मानचित्र पर मजबूती से स्थापित कर दिया है।

चुनौतियों से सफलता तक का सफर
बारनवापारा में कृष्णमृगों का सफर संघर्षपूर्ण रहा है। 1970 के दशक के बाद अतिक्रमण और आवास विनाश के कारण यहाँ से कृष्णमृग लगभग विलुप्त हो गए थे। पांच दशकों के लंबे अंतराल के बाद, अप्रैल 2018 में राज्य वन्यजीव बोर्ड की 9वीं बैठक में इनके पुनरुद्धार को मंजूरी दी गई।

शुरुआती दौर में वन विभाग को चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जब निमोनिया के कारण लगभग आठ कृष्णमृगों की मृत्यु हो गई। इसके बाद विभाग ने सुधार के कड़े कदम उठाए। बाड़ों में रेत की परत बिछाई गई, जलभराव रोकने के लिए जल निकासी की उचित व्यवस्था की गई, अपशिष्ट प्रबंधन सुधारा गया और एक समर्पित पशु चिकित्सक की नियुक्ति की गई। छत्तीसगढ़ वन विभाग के इन निरंतर प्रयासों के परिणामस्वरूप कृष्णमृगों की आबादी अब स्थिर होकर लगभग 200 तक पहुँच गई है।

कृष्णमृग (ब्लैकबक) के बारे में खास बातें:
कृष्णमृग भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला एक सुंदर मृग है। नर कृष्णमृग का रंग गहरा भूरा या काला होता है और उनके पास लंबे, घुमावदार सींग होते हैं, जबकि मादाएं हल्के भूरे रंग की होती हैं और आमतौर पर उनके सींग नहीं होते। ये खुले घास के मैदानों में रहते हैं और मुख्य रूप से घास खाते हैं। इनकी ऊंचाई लगभग 74 से 84 सेंटीमीटर होती है। नरों का वजन 20-57 किलो और मादाओं का वजन 20-33 किलो के बीच होता है। नरों के लहरदार सींग 75 सेंटीमीटर तक लंबे हो सकते हैं, जो इनकी मुख्य पहचान हैं।

