छत्तीसगढ़ इकोसिस्टम की बड़ी कामयाबी: बारनवापारा में दुर्लभ सतरंगी गिलहरी का दीदार

विशेष संवाददाता, रायपुर। रायपुर के बारनवापारा में दिखी दुर्लभ ‘जायंट मालाबार स्क्विरल’, मुख्यमंत्री और वन मंत्री ने जताई खुशी; स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का प्रतीक
छत्तीसगढ़ के जंगलों से वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बेहद सुखद और गौरवान्वित करने वाली खबर आई है। प्रदेश के प्रसिद्ध बारनवापारा क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता में अब एक और नया और दुर्लभ अध्याय जुड़ गया है। बलौदाबाजार वनमंडल के अंतर्गत देवपुर वन परिक्षेत्र में आयोजित ‘देवपुर समर कैंप 2026’ के दौरान वन्यजीव विशेषज्ञों और प्रकृति प्रेमियों ने भारत की सबसे बड़ी और अत्यंत दुर्लभ ‘विशाल भारतीय गिलहरी’ (जायंट मालाबार स्क्विरल) को देखा है। इस खोज के बाद से ही वन्यजीव प्रेमियों और वन विभाग में भारी उत्साह का माहौल है।

तीन फीट लंबी रंग-बिरंगी गिलहरी ने खींचा ध्यान

वैज्ञानिक भाषा में ‘रेटूफा इंडिका’ (Ratufa indica) के नाम से जानी जाने वाली यह गिलहरी भारत की सबसे बड़ी वृक्षवासी (पेड़ों पर रहने वाली) प्रजातियों में से एक है। देवपुर के घने जंगलों में दिखी इस गिलहरी की पूंछ सहित कुल लंबाई लगभग तीन फीट आंकी गई है। इसके शरीर पर गहरे लाल, चमकीले भूरे, काले और क्रीम रंगों का एक अद्भुत और बेहद खूबसूरत मिश्रण दिखाई देता है, जो इसे आम गिलहरियों से बिल्कुल अलग और आकर्षक बनाता है।

पेड़ों पर गगनचुंबी छलांग लगाने में माहिर

विशेषज्ञों के अनुसार, यह अनूठी गिलहरी अपना पूरा जीवन पेड़ों के ऊंचे शिखरों पर ही बिताती है। जमीन पर यह बहुत ही कम उतरती है। एक पेड़ से दूसरे पेड़ के बीच करीब 20 फीट या उससे अधिक लंबी छलांग लगाने की इसकी क्षमता इसे जंगलों का ‘अक्रोबैट’ (कलाबाज) बनाती है। यह मुख्य रूप से फल, फूल, छाल और पेड़ों के बीज खाकर अपना जीवन यापन करती है।

स्वस्थ जंगल और सुरक्षित माहौल का बड़ा प्रमाण

बलौदाबाजार के वनमंडलाधिकारी (DFO) श्री धम्मशील गणवीर ने इस महत्वपूर्ण साइटिंग की पुष्टि करते हुए बताया, “बारनवापारा अभ्यारण्य और उससे लगा देवपुर वन क्षेत्र हमेशा से ही जैव विविधता के मामले में बेहद धनी रहा है। इस अत्यंत शर्मीले और दुर्लभ जीव का देवपुर के जंगलों में स्वच्छंद विचरण करना इस बात का सीधा प्रमाण है कि यहां का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पूरी तरह स्वस्थ, समृद्ध और वन्यजीवों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है।”

कानूनन शिकार पर है पूर्ण प्रतिबंध

यह प्रजाति भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची-2 (Schedule-II) के तहत पूरी तरह संरक्षित है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने भी इसे विशेष श्रेणी में रखा है। वन विभाग के अधिकारियों ने साफ किया है कि इस दुर्लभ जीव का शिकार करना, इसे नुकसान पहुंचाना या इसका अवैध व्यापार करना एक गंभीर और गैर-जमानती अपराध है, जिसके लिए सख्त सजा का प्रावधान है।

समर कैंप के दौरान मिली बड़ी कामयाबी

वन विभाग द्वारा स्थानीय युवाओं और प्रकृति प्रेमियों को वनों के प्रति जागरूक करने के लिए ‘देवपुर समर कैंप 2026’ का आयोजन किया जा रहा है। इसी कैंप के दौरान बर्ड वाचिंग और ट्रैकिंग पर निकले दल को यह ऐतिहासिक कामयाबी मिली। वन विभाग ने अब इस क्षेत्र में गश्त और निगरानी और कड़ी कर दी है ताकि इस दुर्लभ प्रजाति के कुनबे को और सुरक्षित माहौल मिल सके।

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