संवेदना का तकाजा, कानून का तराजू: क्या सरकारी जमीन पर अतिक्रमण रसूख और गरीबी के चश्मे से तय होगा?

रायपुर3जुलाई ।

संवेदना बनाम कानून: नवा रायपुर के नकटी में ‘बुलडोजर’ कार्रवाई के पीछे का पूरा सच

करोड़ों की सरकारी (गौचर) जमीन पर था बरसों का कब्जा; रोते-बिलखते परिवारों की तस्वीरों के पीछे छिपा है आंकड़ों का एक दूसरा स्याह पहलू। नवा रायपुर के ग्राम नकटी में शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाने की हालिया प्रशासनिक कार्रवाई ने पूरे प्रदेश में एक नई बहस छेड़ दी है। बुलडोजर चलते समय मलबे में तब्दील होते आशियाने और रोते-बिलखते परिवारों की तस्वीरें किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर सकती हैं। दशकों से रह रहे परिवारों का बेघर होना निश्चित रूप से पीड़ादायक है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा कानूनी और व्यावहारिक पक्ष भी है, जिसे निष्पक्षता से देखना बेहद जरूरी है।

​अचानक नहीं हुई कार्रवाई, 2 साल से मिल रहे थे नोटिस

​प्रशासनिक दस्तावेजों के अनुसार, नकटी में हुई यह कार्रवाई रातों-रात या अचानक नहीं की गई। संबंधित कब्जाधारियों को पिछले दो वर्षों से लगातार कानूनी नोटिस दिए जा रहे थे और उन्हें स्वेच्छा से जमीन खाली करने के पर्याप्त अवसर मिले। इसके बावजूद शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा बरकरार रखा गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह अतिक्रमण किसी छोटे-मोटे रिहायशी दायरे में नहीं, बल्कि हजारों-दसियों हजार वर्गफुट के विशाल भू-भाग पर फैला हुआ था।

​रसूख या मजबूरी? कब्जे के बड़े आंकड़े

​प्रशासन द्वारा जारी की गई आधिकारिक सूची पर नजर डालें तो साफ होता है कि खेल सिर्फ ‘सिर छुपाने की छत’ का नहीं था, बल्कि बड़े रकबे पर कब्जे का था:

  • देवकुमार (पिता बिसहत रात्रे): 29,700 वर्गफुट
  • जानकी (पति गणेश साहू): 29,600 वर्गफुट
  • मुकेश (पिता मनहरण पाल): 19,800 वर्गफुट
  • माया राम (पिता लैनू यादव): 18,500 वर्गफुट
  • दूरपति (पति बिसहत रात्रे): 18,300 वर्गफुट
  • मनोज (पिता अमरीका साहू): 17,200 वर्गफुट
  • स्कुलू राम साहू: 15,600 वर्गफुट
  • घसिया (पिता इतवारी बघेल): 14,700 वर्गफुट
  • भूरी पाल (पति शंकर पाल): 14,600 वर्गफुट
  • राजलाल (पिता भजन ढीढी): 14,400 वर्गफुट
  • ​प्रभावित परिवारों को नवा रायपुर के सेक्टर-30 में आवास उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
  • ​सामान्य दिनों में हाउसिंग बोर्ड इन फ्लैटों को लगभग ₹8 लाख में बेचता है, जो अब प्रभावितों को मालिकाना हक के साथ दिए जा रहे हैं।
  • ​जिन लोगों के प्रधानमंत्री आवास योजना के मकान इस कार्रवाई की जद में आए, उन्हें भी इसी नीति के तहत शिफ्ट किया जा रहा है।

14.85 करोड़ का एक ही कब्जा: स्थानीय बाजार मूल्य के अनुसार यहाँ जमीन की कीमत लगभग ₹5,000 प्रति वर्गफुट है। इस लिहाज से केवल देवकुमार रात्रे के कब्जे वाली 29,700 वर्गफुट जमीन का अनुमानित बाजार मूल्य ₹14.85 करोड़ बैठता है। यानी करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति का सालों तक निजी कमर्शियल या व्यक्तिगत उपयोग होता रहा।

​चरागाह (गौचर) की जमीन: जिस पर हक पूरे समाज का है

​पड़ताल में यह बात भी सामने आई है कि यह जमीन कोई सामान्य आवासीय कॉलोनी की नहीं, बल्कि शासकीय भाटा/चरागाह (गौचर) भूमि है। कानूनन इस तरह की जमीन का उपयोग केवल स्कूल, अस्पताल, गौशाला या सार्वजनिक हित के कार्यों के लिए ही किया जा सकता है।

​भविष्य में इस जमीन पर विधायकों के आवास बनेंगे या कोई अन्य सरकारी परियोजना आएगी, यह सरकार का नीतिगत विषय हो सकता है और इस पर राजनीतिक विरोध भी जायज है; लेकिन यह राजनीतिक बहस किसी भी सूरत में सार्वजनिक/शासकीय भूमि पर किए गए अवैध अतिक्रमण को वैध नहीं ठहरा सकती।

​पुनर्वास: ₹8 लाख का फ्लैट और मालिकाना हक

​शासन ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए विस्थापितों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था भी की है।

  • ​प्रभावित परिवारों को नवा रायपुर के सेक्टर-30 में आवास उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
  • ​सामान्य दिनों में हाउसिंग बोर्ड इन फ्लैटों को लगभग ₹8 लाख में बेचता है, जो अब प्रभावितों को मालिकाना हक के साथ दिए जा रहे हैं।
  • ​जिन लोगों के प्रधानमंत्री आवास योजना के मकान इस कार्रवाई की जद में आए, उन्हें भी इसी नीति के तहत शिफ्ट किया जा रहा है।

बड़ी चुनौती: प्रशासन को सिर्फ छत देकर पल्ला नहीं झाड़ना चाहिए। पुनर्वास स्थल पर इन परिवारों के रोजगार, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और उनके पास मौजूद पशुधन (मवेशियों) के रखरखाव के लिए पुख्ता इंतजाम करने होंगे।

​सबसे बड़ा सवाल: आम ईमानदार टैक्सपेयर के साथ न्याय कब?

​इस पूरे मामले में न्याय का एक नैतिक पहलू भी उठता है। रायपुर का एक आम मध्यमवर्गीय परिवार 800 या 1,000 वर्गफुट का एक छोटा सा प्लॉट खरीदने के लिए अपनी जीवनभर की गाढ़ी कमाई लगा देता है। वह 20 से 30 साल तक बैंक की भारी-भरकम ईएमआई (EMI) भरता है, रजिस्ट्री फीस देता है, टैक्स चुकाता है और नियम-कायदों के दायरे में रहता है।

​दूसरी तरफ, यदि कोई व्यक्ति हजारों वर्गफुट सरकारी जमीन दबाकर बैठ जाए, तो क्या केवल ‘भावनात्मक आधार’ पर उसे सही ठहराया जा सकता है?

​नकटी में कुछ कब्जाधारियों ने उसी सरकारी जमीन पर ₹50 लाख तक के आलीशान मकान बना रखे थे। कईयों के पास पर्याप्त आर्थिक संसाधन और पशुधन थे। इसलिए पूरे मामले को सिर्फ “गरीब बनाम सरकार” के चश्मे से देखना पूरी तरह गलत होगा। यहाँ वास्तविक जरूरतमंदों की आड़ में सक्षम लोगों ने भी मलाई काटी है।

​कानून की नजर में सब बराबर: रसूखदारों पर भी चले बुलडोजर

​इस कार्रवाई ने जनता के बीच एक पुरानी धारणा को भी हवा दी है कि—”बुलडोजर हमेशा गरीबों की झोपड़ी पर जल्दी चलता है, जबकि रसूखदारों के अवैध महल सालों-साल सुरक्षित रहते हैं।”

​यदि सरकार वास्तव में ‘कानून का राज’ स्थापित करना चाहती है, तो उसे इस धारणा को तोड़ना होगा। सामूहिक अतिक्रमण (गरीबों की बस्तियां) सीधे नजर में आते हैं, जबकि रसूखदारों, नेताओं और बड़े व्यापारियों के अवैध कब्जे व्यक्तिगत और छिपे होते हैं। कानून की लाठी का पैमाना सबके लिए एक समान होना चाहिए—अवैध कब्जा चाहे गरीब का हो या किसी अमीर का, कार्रवाई की कठोरता में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।

निष्कर्ष:

संवेदना अपनी जगह बेहद जरूरी है और विस्थापितों का सम्मानजनक पुनर्वास सरकार का पहला कर्तव्य होना चाहिए। लेकिन गलत को सिर्फ इसलिए सही नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह बरसों से चला आ रहा था। सार्वजनिक संपत्ति पूरे समाज की होती है, किसी व्यक्ति विशेष की बपौती नहीं।

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