रायगढ़ के डोलनारायण ने जैविक खेती से ‘मिट्टी’ को बनाया ‘सोना’

रायपुर/रायगढ़, 9 मई 2026

सफलता की नई इबारत: रायगढ़ के डोलनारायण ने जैविक खेती से ‘मिट्टी’ को बनाया ‘सोना’


छत्तीसगढ़ के किसानों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यदि खेती में आधुनिक तकनीक और पारंपरिक जैविक खाद का सही मिश्रण हो, तो कम जमीन से भी बंपर मुनाफा कमाया जा सकता है। रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखंड के ग्राम डोलनारायण पटेल आज पूरे प्रदेश के युवाओं और किसानों के लिए ‘रोल मॉडल’ बनकर उभरे हैं।

75 डिसमिल जमीन और 75 हजार की कमाई

आमतौर पर किसान मिर्च की खेती में भारी मात्रा में कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं, लेकिन डोलनारायण ने लीक से हटकर 75 डिसमिल जमीन पर पूरी तरह जैविक मिर्च उगाई। उनकी मेहनत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज 15 दिनों की पहली तुड़ाई में ही उन्होंने 75,000 रुपये की मिर्च बेच ली।

खासियत जो बाजार में छाई:

  • उत्पादकता: एक ही पौधे से लगभग 1.25 किलो मिर्च प्राप्त हुई।
  • गुणवत्ता: जैविक होने के कारण मिर्च की चमक अधिक और तीखापन प्राकृतिक है।
  • बाजार भाव: शानदार गुणवत्ता की वजह से उन्हें मंडी में 5,000 रुपये प्रति क्विंटल का प्रीमियम दाम मिला।

रसायन मुक्त खेती: गोबर खाद का कमाल

डोलनारायण की सफलता का सबसे बड़ा आधार रासायनिक खादों (यूरिया-डीएपी) का पूर्ण त्याग है। उन्होंने खेत की उर्वरता बढ़ाने के लिए केवल गोबर खाद (करीब 3 ट्रॉली) का उपयोग किया। इससे न केवल लागत कम हुई, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य में भी सुधार हुआ। कृषि विभाग के मार्गदर्शन में उन्होंने स्प्रिंकलर (फव्वारा सिंचाई) और आधुनिक कृषि उपकरणों को अपनाया, जिससे पानी की बचत के साथ श्रम की भी बचत हुई।

17 एकड़ में फैला साम्राज्य

डोलनारायण अब केवल एक साधारण किसान नहीं, बल्कि एक कृषि-उद्यमी (Agri-entrepreneur) के रूप में कार्य कर रहे हैं। उनके पास वर्तमान में कुल 17 एकड़ भूमि है, जिसमें से 6 एकड़ स्वयं की और 11 एकड़ लीज पर है। उनके पास अपने ट्रैक्टर और हार्वेस्टर हैं, जिससे वे न केवल अपनी खेती करते हैं, बल्कि अन्य किसानों को किराए पर देकर अतिरिक्त आय भी अर्जित कर रहे हैं।

अगला लक्ष्य: जवाफूल धान की खुशबू

मिर्च की बंपर पैदावार से उत्साहित होकर डोलनारायण ने अब खरीफ सीजन के लिए बड़ा लक्ष्य तय किया है। वे आगामी सीजन में 4 एकड़ में छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पारंपरिक सुगंधित किस्म ‘जवाफूल धान’ की जैविक खेती करेंगे।
डोलनारायण पटेल का कहना है कि, “खेती को घाटे का सौदा कहना गलत है। अगर हम नई सोच, वैज्ञानिक तकनीक और जैविक पद्धति को अपनाएं, तो खेती से बेहतर कोई व्यवसाय नहीं है।” उनकी यह सफलता लैलूंगा क्षेत्र के उन युवाओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *