विशेष संवाददाता, रायपुर 7 जून । जनभागीदारी से बदला जल संरक्षण का स्वरूप, 1 लाख से अधिक जल संरचनाओं का निर्माण जारी
बालोद, कांकेर, दुर्ग और बीजापुर जिलों में शानदार काम, आजीविका के खुले नए द्वार
जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित वर्षा और बढ़ते जल संकट के इस दौर में छत्तीसगढ़ ने जल संरक्षण की दिशा में एक बेहद अनुकरणीय और ऐतिहासिक कदम उठाया है। राज्य में जल सहेजने और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने के लिए एक विशाल जनअभियान ‘मोर गांव-मोर पानी’ धरातल पर आकार ले रहा है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत संचालित इस महाअभियान ने अब एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले लिया है। इसके जरिए जल संरक्षण, रोजगार सृजन, हरित विकास और आजीविका संवर्धन को एक साथ जोड़ा जा रहा है।
1610 करोड़ रुपये का मेगा प्लान
इस महाअभियान के तहत प्रदेशभर में लगभग 1610 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से एक लाख से अधिक जल संरक्षण एवं संवर्धन कार्यों को मंजूरी दी गई है, जिन पर तेजी से काम चल रहा है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य वर्षा के पानी को व्यर्थ बहने से रोकना और उसे ज्यादा से ज्यादा जमीन के भीतर उतारना है। इसके लिए गांवों में वैज्ञानिक तरीके से तालाब, डबरियां (छोटे गड्ढे), चेकडैम, जल संवर्धन संरचनाएं, स्टैगर्ड कंटूर ट्रेंच और खेत तालाबों का निर्माण किया जा रहा है। इन जल संरचनाओं से न केवल भू-जल स्तर में सुधार होगा, बल्कि आने वाले समय में ग्रामीणों को पानी के भीषण संकट से भी मुक्ति मिलेगी।
जमीनी हकीकत: अलग-अलग जिलों में आ रहे बड़े बदलाव
‘मोर गांव-मोर पानी’ अभियान के तहत प्रदेश के जिलों में रिकॉर्ड स्तर पर काम हो रहे हैं:
- बालोद जिला: यहाँ के गुंडरडेही विकासखंड सहित पूरे जिले में जल संरक्षण और ग्रामीण आजीविका सुदृढ़ीकरण के लिए तेजी से काम हो रहे हैं। बालोद में अब तक जल संरक्षण से संबंधित 8,550 कार्य कराए जा चुके हैं, जिनमें नवा तरिया, रेन वाटर हार्वेस्टिंग और आजीविका डबरी मुख्य हैं।
- उत्तर बस्तर कांकेर जिला: पर्यावरण संरक्षण और जल संवर्धन के मामले में कांकेर जिला प्रदेश में अपनी एक अलग पहचान बना रहा है। यहाँ भूजल स्तर सुधारने के लिए 11,495 जल संरक्षण संरचनाएं बनाई गई हैं, जिनमें 2,597 आजीविका डबरी शामिल हैं।
- दुर्ग जिला: दुर्ग जिले में अभियान के तहत मनरेगा से 102 ग्राम पंचायतों में 112 नया तरिया और तालाब गहरीकरण का काम तेजी से जारी है, जिससे जल भंडारण क्षमता बढ़ रही है।
- बीजापुर जिला: नक्सल प्रभावित बीजापुर में 5.89 करोड़ रुपये की लागत से 294 से अधिक जल संरक्षण और संवर्धन कार्य पूरे किए गए हैं। यहाँ 166 डबरी निर्माण से गरीब किसानों को सिंचाई, कृषि और मत्स्य पालन के लिए स्थायी जरिया मिला है।
रोजगार के साथ महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल
‘मोर गांव-मोर पानी’ अभियान संकट के समय ग्रामीणों के लिए बड़ा आर्थिक सहारा बनकर उभरा है। वर्तमान में इन कार्यों के माध्यम से प्रदेश में प्रतिदिन 11 लाख से अधिक श्रमिकों को सीधे उनके गांव में ही रोजगार मिल रहा है। सबसे खास बात यह है कि इन श्रमिकों में 57 प्रतिशत से अधिक भागीदारी महिलाओं की है। इस तरह यह अभियान न केवल पर्यावरण को बचा रहा है, बल्कि आधी आबादी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूत कर रहा है।
कमजोर वर्गों के लिए ‘आजीविका डबरियां’ बनीं सहारा
राज्य सरकार ने जल संरक्षण को केवल गड्ढे खोदने तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे सीधे लोगों की कमाई से जोड़ दिया है। समाज के संवेदनशील और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के विकास के लिए उनकी निजी भूमि पर 13,065 आजीविका डबरियों का निर्माण पूरा कर लिया गया है। पानी से लबालब इन डबरियों की मदद से अब गरीब ग्रामीण परिवार मत्स्य पालन (मछली पालन), बागवानी, उन्नत सब्जी उत्पादन और अन्य आय बढ़ाने वाले काम कर रहे हैं। इससे उनकी हर महीने की आमदनी में बड़ा इजाफा हुआ है।
नवा तरिया-आय के जरिया: स्व-सहायता समूहों को बड़ी ताकत
गांवों के सामुदायिक तालाबों की सूरत बदलने और उन्हें कमाई का जरिया बनाने के लिए सरकार ‘नवा तरिया-आय के जरिया’ पहल चला रही है। इसके तहत राज्य में 624 सामुदायिक तालाबों को विशेष रूप से विकसित किया जा रहा है। इन तालाबों के प्रबंधन और व्यावसायिक उपयोग की जिम्मेदारी गांवों के महिला स्व-सहायता समूहों (SHGs) को सौंपी गई है। महिलाएं इन तालाबों में मछली पालन और सिंघाड़े की खेती जैसे काम करके अच्छा मुनाफा कमा रही हैं। जल संरक्षण और महिला सशक्तिकरण का यह अनूठा मॉडल आज पूरे देश के लिए एक मिसाल बन चुका है।
