छतीसगढ़ में एचपीवी टीकाकरण अभियान: बलरामपुर-रामानुजगंज और कोरिया 90% कवरेज के साथ सबसे आगे, नारायणपुर सबसे पीछे

रायपुर 30 जून :
छत्तीसगढ़ में 28 फरवरी से 29 जून 2026 तक चले ‘यूविन प्रोग्रेसिव एचपीवी टीकाकरण अभियान’ (UWIN Progressive HPV Vaccination Coverage) के आधिकारिक आंकड़े सामने आ गए हैं। राज्य ने लक्षित आबादी के मुकाबले अब तक कुल 20% टीकाकरण कवरेज हासिल किया है। प्रदेश के कुल 3,12,522 लक्षित बच्चों/किशोरियों में से 60,953 को टीका लगाया जा चुका है। राज्य में कुल 18,264 नियोजित सत्रों (Sessions Planned) में से 15,443 सत्र (85%) आयोजित किए गए।

जिलों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो कुछ जिलों ने शानदार काम किया है, जबकि कई बड़े और आदिवासी बहुल जिलों में रफ्तार बेहद धीमी है।

🌟 टॉप परफॉर्मर्स: उत्तर छत्तीसगढ़ का शानदार प्रदर्शन

टीकाकरण अभियान में राज्य के दो जिलों ने बेहतरीन काम करते हुए 90% का आंकड़ा छुआ है:

  • बलरामपुर-रामानुजगंज: 8,785 की लक्षित आबादी में से 7,931 को टीका लगाकर 90% कवरेज के साथ राज्य में पहले नंबर पर है।
  • कोरिया: छोटे लक्ष्य (2,375) के साथ 90% कवरेज हासिल कर दूसरे स्थान पर बना हुआ है।
  • बालोद (45%) और रायगढ़ (43%) क्रमशः तीसरे और चौथे स्थान पर हैं।

📉 फिसड्डी जिले: बस्तर संभाग और बड़े शहरों में सुस्ती

अभियान के आंकड़े बताते हैं कि बस्तर संभाग के जिलों और राज्य के कुछ सबसे बड़े शहरी केंद्रों में जागरूकता या पहुंच की भारी कमी है:

  • नारायणपुर: केवल 3% कवरेज (1,686 में से सिर्फ 46 टीके) के साथ पूरे राज्य में सबसे अंतिम पायदान पर है।
  • कोंडागांव: यहां भी स्थिति चिंताजनक है और मात्र 3% लक्ष्य ही पूरा हो सका है।
  • सुकमा और जांजगीर-चांपा: दोनों जिले 4% कवरेज पर अटके हुए हैं।
  • रायपुर और बिलासपुर: राज्य के सबसे प्रमुख जिलों में शामिल रायपुर में 10% और बिलासपुर में केवल 8% टीकाकरण हुआ है, जो शहरी क्षेत्रों में अभियान की सुस्त रफ्तार को दर्शाता है।

📊 सत्र आयोजन में किसने मारी बाजी?

सत्रों के सफल आयोजन (% of Session Held) के मामले में बालोद और खैरागढ़-छुईखदान-गंडई सबसे आगे रहे, जहां तय किए गए सत्रों में से 98% सत्र सफलतापूर्व आयोजित किए गए। इसके विपरीत, नारायणपुर में केवल 53% नियोजित सत्र ही आयोजित हो सके, जो इसकी असफलता का एक बड़ा कारण है।

छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में एचपीवी (HPV) टीकाकरण की कम कवरेज और धीमी रफ्तार के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं। आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि नारायणपुर (3%), कोंडागांव (3%) और सुकमा (4%) जैसे आदिवासी बहुल और रायपुर (10%) व बिलासपुर (8%) जैसे बड़े शहरी जिलों में कम टीकाकरण के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

1. जागरूकता की कमी और सामाजिक भ्रांतियां (Awareness Barriers)

  • यौन संचारित संक्रमण (STI) से जुड़ाव: एचपीवी वायरस मुख्य रूप से यौन संपर्क से फैलता है। समाज में इस विषय पर खुलकर बात न होने के कारण माता-पिता अपनी किशोरियों को यह टीका दिलवाने में संकोच या हिचकिचाहट महसूस करते हैं।
  • कैंसर और टीके के संबंध की अधूरी जानकारी: ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में लोगों को यह पता ही नहीं है कि गर्भाशय कैंसर (Cervical Cancer) से बचाव के लिए कोई टीका उपलब्ध है।
  • दुष्प्रभावों का डर: टीके के बाद होने वाले सामान्य बुखार या दर्द जैसी प्रतिक्रियाओं को लेकर स्थानीय समुदायों में कई तरह की अफवाहें और भ्रांतियां फैल जाती हैं, जिससे लोग आगे नहीं आते।

2. लॉजिस्टिक्स और बुनियादी ढांचे की चुनौतियां (Logistical Challenges)

  • कोल्ड चेन प्रबंधन (Cold Chain Maintenance): एचपीवी वैक्सीन (Gardasil-4) को बेहद नियंत्रित तापमान पर रखना अनिवार्य होता है। नारायणपुर और सुकमा जैसे बस्तर संभाग के दूरदराज और संवेदनशीलता वाले इलाकों में बिजली की निरंतर आपूर्ति न होने से कोल्ड चेन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।
  • सत्रों का रद्द होना: आंकड़ों के मुताबिक नारायणपुर में केवल 53% सत्र ही आयोजित हो सके। सुदूर वनांचलों में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (ANM/मितानिन) की कमी या भौगोलिक बाधाओं के कारण तय समय पर सत्र आयोजित नहीं हो पाते।
  • सहमति पत्र (Parental Consent) की कानूनी अनिवार्यता: सरकार के नियमानुसार इस स्वैच्छिक टीके के लिए माता-पिता की लिखित सहमति अनिवार्य है। अंदरूनी क्षेत्रों में माता-पिता तक समय पर सहमति पत्र पहुंचाना और उन्हें राजी करना एक जटिल प्रशासनिक कार्य बन जाता है।

3. शहरी क्षेत्रों की सुस्ती (Urban Complacency)

  • रायपुर और बिलासपुर जैसे विकसित जिलों में कम कवरेज का मुख्य कारण ‘वैक्सीन हेसीटेंसी’ (टीकाकरण के प्रति उदासीनता) है। शहरी आबादी में अक्सर सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों के बजाय निजी अस्पतालों पर निर्भरता होती है, जिससे सरकारी मुफ्त अभियान की गति इन जिलों में धीमी रह गई है।

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