बस्तर में ट्रिगर से ‘स्टेयरिंग’ तक: सुकमा की वादियों में बारूदी गंध पर भारी पड़ी जिंदगी की नई रफ्तार

बस्तर में ट्रिगर से ‘स्टेयरिंग’ तक: सुकमा की वादियों में बारूदी गंध पर भारी पड़ी जिंदगी की नई रफ्तार

– विशेष संपादकीय आलेख –

रायपुर/सुकमा।

​दशकों तक जिस बस्तर को लाल आतंक की हिंसक परछाइयों, बारूदी सुरंगों और बंदूकों की कड़वाहट से मापा गया, आज उसी बस्तर के सुकमा जिले से उम्मीदों की एक ऐसी खिड़की खुली है, जिसकी रोशनी पूरे देश को चकाचौंध कर रही है। यह छत्तीसगढ़ के इतिहास का वह स्वर्णिम पन्ना है, जहाँ बीती रात के खौफ को पीछे छोड़कर युवा एक नई सुबह का स्वागत कर रहे हैं। कभी अपनों के खिलाफ ही बंदूक उठाने वाले युवाओं के मजबूत हाथों में अब विनाश का हथियार नहीं, बल्कि विकास और आत्मनिर्भरता का स्टेयरिंग व्हील है।

​मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के संवेदनशील नेतृत्व और सुकमा जिला प्रशासन की दृढ़ इच्छाशक्ति ने यह साबित कर दिया है कि बस्तर की समस्या का असली समाधान गोली नहीं, बल्कि भटके हुए युवाओं को गले लगाना और उनके हाथों को हुनरमंद बनाना है।

​आत्मसमर्पण का ‘फुल स्टॉप’, आत्मनिर्भरता का ‘कॉमा’

​सुकमा का ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (RSETI) इन दिनों केवल एक ट्रेनिंग सेंटर नहीं, बल्कि जिंदगियों को पुनर्जीवित करने वाला ‘पुनर्जन्म केंद्र’ बन चुका है। यहाँ 13 जून से आगामी 12 जुलाई तक संचालित हो रहा 30 दिवसीय ‘लाइट मोटर व्हीकल’ (LMV) ऑनर ड्राइवर प्रशिक्षण बस्तर के इतिहास में मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।

​इस ऐतिहासिक बदलाव के सारथी बन रहे हैं 31 युवा। प्रशासन इन्हें सिर्फ एक ‘ड्राइवर’ की नौकरी के लिए तैयार नहीं कर रहा, बल्कि इन्हें ‘ऑनर’ (मालिक) बनने का आत्मबल दे रहा है। 30 दिनों के इस कड़े और व्यावहारिक सैन्य-जैसे अनुशासन वाले प्रशिक्षण में इन्हें:

  • सड़क सुरक्षा के आधुनिक वैश्विक मानक
  • यातायात के नियम और तकनीकी रोड संकेत
  • इंजन की बारीकियां और त्वरित मरम्मत (मैकेनिकल ट्रबलशूटिंग)

​सिखाया जा रहा है। इसका मकसद साफ है—कल को जब ये युवा सड़क पर गाड़ी लेकर निकलें, तो वे किसी पर निर्भर न रहें, बल्कि अपने भाग्य के निर्माता खुद बनें।

​बस्तर की ‘रोड सिस्टर्स’: रूढ़ियों और डर को कुचलती बेटियां

​इस मानवीय क्रांति की सबसे प्रेरक और भावुक करने वाली तस्वीर यह है कि इसमें बस्तर की बेटियां स्टीयरिंग संभालकर रूढ़ियों को पीछे छोड़ रही हैं।

​”एक वक्त था जब हमें सिर्फ डर का अहसास होता था। लेकिन यहाँ आकर हमारी दुनिया बदल गई। हमें गाड़ी चलाना ही नहीं, समाज में सम्मान से जीना सिखाया जा रहा है। अब हमें पूरा भरोसा है कि हम अपने पैरों पर खड़े होकर अपने परिवार का नाम रोशन करेंगे। यह हमारा नया जन्म है।”

सोड़ी सोमड़ी, संभागगी प्रशिक्षणार्थी

​इसी हौसले को हवा देते हुए पुनेम ज्योति कहती हैं, “रोजाना की क्लास ने हमारे भीतर के हर संकोच और डर को खत्म कर दिया है। अब हमारे हाथों में हुनर है। ड्राइविंग सीखने के बाद हम खुद कमाएंगे और अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बनेंगे। हम सरकार के इस उपकार को कभी नहीं भूल सकते।”

​प्रशासन का सीधा एक्शन: ट्रेनिंग खत्म, हाथ में चमचमाता लाइसेंस

​सुकमा के युवा कलेक्टर श्री अमित कुमार ने इस पूरी योजना को प्रशासनिक कड़ेपन से इतर मानवीय संवेदना के साथ लागू किया है। वे जानते हैं कि हुनर तब तक अधूरा है जब तक उसे कानूनी मान्यता न मिले।

​”हमारा उद्देश्य इन युवाओं को सिर्फ सर्टिफिकेट बांटना नहीं है। जिला प्रशासन ने तय किया है कि 12 जुलाई को जैसे ही इनका 30 दिनों का यह प्रशिक्षण पूरा होगा, इन सभी 31 प्रतिभागियों के हाथों में उनका परमानेंट ड्राइविंग लाइसेंस सौंप दिया जाएगा। ताकि वे अगले ही दिन से रोजगार या अपने स्वरोजगार की गाड़ी बेधड़क दौड़ा सकें।”

श्री अमित कुमार, कलेक्टर, सुकमा

​निष्कर्ष: गोलियों की गूंज पर भारी, विकास की हुंकार

​यह केवल एक सरकारी योजना की सफलता नहीं है, यह छत्तीसगढ़ सरकार की नीति, नीयत और सुशासन का जीवंत प्रमाण है। सुकमा के ये 31 युवा देश के भटके हुए तमाम युवाओं के लिए एक नजीर हैं कि रास्ता चाहे कितना भी पथरीला क्यों न हो, अगर सरकार का संरक्षण और प्रशासन का सही मार्गदर्शन मिले, तो जिंदगी की दिशा और दशा दोनों बदली जा सकती है।

​बस्तर अब बदल नहीं रहा है, बस्तर अब दौड़ रहा है—और इस बार इसकी रफ्तार किसी बारूद से नहीं, बल्कि इन युवाओं के सपनों और आत्मनिर्भरता के पहियों से तय हो रही है!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *