मासूमों की ‘जलसमाधि’ पर जागा प्रशासन: अब खोदा गड्ढा तो नपेंगे अफसर और ठेकेदार!

  • छत्तीसगढ़ के सभी नगरीय निकायों में ‘हाई अलर्ट’: मानसून में खुले गड्ढे और अधूरी नालियां बनीं ‘डेथ ट्रैप’ (Death Traps)
  • बाल अधिकार संरक्षण आयोग की तल्ख टिप्पणी के बाद संचालनालय का ‘इमरजेंसी ऑर्डर’ जारी
  • दिखावे की कागजी कार्रवाई नहीं चलेगी, हर महीने कमिश्नर और CMO को देनी होगी ‘सर्टिफिकेट ऑफ सेफ्टी’

रायपुर 11 जुलाई । छत्तीसगढ़ में मानसून की पहली बौछारें आते ही विकास के दावों की कलई खुल गई है, लेकिन इस बार बात सिर्फ जलभराव की नहीं, बल्कि हमारे नौनिहालों की जिंदगी की है। प्रदेश की चमचमाती कॉलोनियों और सड़कों के किनारे मौत बनकर पसरे खुले गड्ढों और अधूरी नालियों पर आखिरकार शासन ने सबसे कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की बेहद सख्त और तल्ख अनुशंसा के बाद, नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय ने राज्य के सभी नगरीय निकायों को ‘आपातकालीन सुरक्षा आदेश’ (आदेश क्र. GENS-2101/5034/2026-UADD SEC) जारी कर दिया है।

​साफ शब्दों में कहें तो, अब अगर किसी भी प्राइवेट बिल्डर या सरकारी ठेकेदार की लापरवाही से किसी बच्चे को खरोंच भी आई, तो सीधे जेल की हवा खानी पड़ेगी।

आयोग का गुस्सा: “क्या मासूमों की जान इतनी सस्ती है?”

​इस पूरे मामले में छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने ‘बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम 2005’ की धारा 13 और 15 का हवाला देते हुए शासन को आईना दिखाया है। आयोग ने बेहद दुख और आक्रोश के साथ दर्ज किया है कि:

​”नई कॉलोनियों में खोदे गए अनफिनिश्ड गड्ढे, सड़कों के किनारे खुली छोड़ दी गई मौत जैसी नालियां और बारिश के पानी का भ्रम… ये सब मिलकर बच्चों के लिए ‘डेथ ट्रैप’ बन चुके हैं। स्कूल जाते या खेलते समय बच्चों को यह समझ नहीं आता कि पानी के नीचे सड़क है या पाताल। यह बेहद दुखद और असहनीय है।”

ये 3 ‘कमांडमेंट’ जिनके बिना अब छत्तीसगढ़ में पत्ता भी नहीं हिलेगा:

​प्रशासन ने इस बार सिर्फ नोटिस नहीं थमाया है, बल्कि तीन ऐसे कड़े नियम लागू कर दिए हैं जो तत्काल प्रभाव से जमीन पर दिखने चाहिए:

  • 1. ‘बल्ली-बाड़ी’ का सुरक्षा कवच (युद्धस्तर पर सर्वे): राज्य के हर शहरी इलाके में तत्काल एक विशेष सर्वे अभियान शुरू किया जा रहा है। जितने भी खुले गड्ढे और आधी-अधूरी नालियां हैं, उन्हें या तो तुरंत समतल किया जाएगा या फिर उनके चारों तरफ मजबूत ‘बल्ली-बाड़ी’ (बैरिकेटिंग) का ऐसा घेरा बनाया जाएगा जिसे बच्चे पार न कर सकें।
  • 2. नींव खोदी तो फेंसिंग जरूरी (बिल्डरों पर नकेल): चाहे कोई रसूखदार प्राइवेट बिल्डर हो या सरकारी निर्माण एजेंसी, अगर बिल्डिंग बनाने के लिए नींव (Foundation) या कॉलम का गड्ढा खोदा गया है, तो उसे चारों तरफ से एयर-टाइट बंद करना होगा। लापरवाही मिलने पर प्रोजेक्ट का लाइसेंस रद्द करने तक की कार्रवाई हो सकती है।
  • 3. संवेदनशील साइट्स पर ‘गार्ड’ अनिवार्य: जिन निर्माण स्थलों पर खतरा सबसे ज्यादा है, वहां निर्माण एजेंसियों को जेब ढीली करनी होगी और 24 घंटे के लिए सुरक्षाकर्मी या चौकीदार तैनात करना होगा, ताकि खेलते हुए बच्चे वहां फटक भी न सकें।

कागजी घोड़े दौड़ाने का दौर खत्म; अब हर महीने देना होगा हिसाब

​अक्सर देखा जाता है कि ऐसे हादसों के बाद बड़े-बड़े आदेश जारी होते हैं और फिर फाइलें धूल खाने लगती हैं। लेकिन इस बार संचालनालय ने इस लूपहोल को भी बंद कर दिया है।

​अब सभी नगर निगम आयुक्तों और मुख्य नगरपालिका अधिकारियों (CMO) को प्रत्येक माह ‘अनुपालन रिपोर्ट’ (Compliance Report) क्षेत्रीय संयुक्त संचालकों के माध्यम से सीधे मंत्रालय भेजनी होगी। इसका मतलब साफ है—अगर इस महीने लापरवाही ठीक नहीं हुई, तो अगले महीने अधिकारी की कुर्सी खतरे में आ जाएगी।

विशेष टिप्पणी

बारिश का मौसम बच्चों के लिए खुशियां लेकर आता है, मातम नहीं। शासन का यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन इसकी असली परीक्षा तब होगी जब नगर निगम के अमले एसी कमरों से बाहर निकलकर सड़कों पर बिखरी इस ‘साइलेंट डेथ’ को सच में ढंकने का काम करेंगे। जनता की नजरें अब सीधे प्रशासन के इस ‘एक्शन मोड’ पर टिकी हैं।

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