विशेष संपादकीय रिपोर्ट | रायपुर 14 जुलाई।
यह सिर्फ एक उपहार नहीं… यह भारत के मुकुट में जड़े छत्तीसगढ़ के उस सांस्कृतिक हीरे की चमक है, जिसने विश्व कूटनीति के सबसे बड़े मंच को अपनी आभा से चकाचौंध कर दिया।
जब नई दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय राजनयिक गलियारे में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री श्री क्रिस्टोफर लक्सन का स्वागत किया, तो दुनिया की नजरें उस ‘सौगात’ पर टिक गईं जो भारत की ओर से दी जाने वाली थी। पीएम मोदी ने जैसे ही लाल मखमली आवरण हटाकर छत्तीसगढ़ के बस्तर की ‘ढोकरा ट्री ऑफ लाइफ’ (जीवन वृक्ष) शिल्पकृति उनके हाथों में सौंपी, वैसे ही बस्तर के जंगलों में गूंजने वाला एक आदिम शिल्प, वैश्विक मित्रता का सबसे बड़ा और जीवंत घोषणापत्र बन गया।

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के यशस्वी नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान आज लोक-कहानियों से निकलकर सीधे ‘ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स’ (वैश्विक भू-राजनीति) के शिखर पर जा बैठी है। यह पल हर उस छत्तीसगढ़िया के लिए अपनी छाती चौड़ी करने का है, जो अपनी माटी से प्यार करता है।
💎 अद्वितीय… अलौकिक… अपरिवर्तनीय: क्यों हैरान है दुनिया?
बस्तर की यह ढोकरा कला कोई सामान्य हस्तशिल्प नहीं है। यह सभ्यता के उदय की कहानी है:
- इतिहास का जीवंत साक्ष्य (4000 वर्ष पुरानी विरासत): जब दुनिया की महान सभ्यताएं आकार ले रही थीं, तब बस्तर का आदिवासी समुदाय ‘लॉस्ट वैक्स कास्टिंग’ (मोम सांचा ढलाई) की कला जानता था। मोहनजोदड़ो की कांस्य नर्तकी से लेकर आज न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री के हाथ में शोभा बढ़ा रही इस कृति तक, छत्तीसगढ़ ने इतिहास को जिंदा रखा है।
- मशीनों को चुनौती देता इंसानी हुनर: आज की डिजिटल और एआई (AI) की दुनिया में, जहाँ हर चीज़ फैक्ट्री में बनती है, बस्तर का शिल्पकार मिट्टी, मोम और आग के तालमेल से इसे पूरी तरह अपने हाथों से गढ़ता है। इसका मतलब है कि इस पूरी कायनात में इस ‘ट्री ऑफ लाइफ’ की कोई दूसरी ‘कॉपी’ या जुड़वां कलाकृति संभव ही नहीं है!
- महाद्वीपों को जोड़ता दर्शन: भारत के लिए यह इच्छाएं पूरी करने वाला ‘कल्पवृक्ष’ है। कमाल की बात यह है कि न्यूजीलैंड के मूल निवासी (माओरी समुदाय) भी प्रकृति के इसी अंतर्संबंध को ‘व्हाकापापा’ कहते हैं। पीएम मोदी की इस जादुई कूटनीतिक सोच ने छत्तीसगढ़ की कला के जरिए दो महाद्वीपों के दिलों को एक झटके में जोड़ दिया।
🏹 मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का संकल्प: ‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ से ‘रचबो वैश्विक छत्तीसगढ़’
राज्य में मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय और संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल के आने के बाद छत्तीसगढ़ की लोककलाओं को सिर्फ संरक्षण नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार देने का संकल्प लिया गया है। इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम ने साय सरकार की नीतियों पर वैश्विक स्वीकृति की मुहर लगा दी है।
💬 “यह बस्तर के पसीने की वैश्विक खुशबू है…”
“प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा बस्तर की ढोकरा कला को इस सर्वोच्च स्तर पर चुनना, हमारी जनजातीय संस्कृति और कलाकारों की सदियों की साधना का ईश्वरीय पुरस्कार है। यह इस बात का शंखनाद है कि छत्तीसगढ़ अब सिर्फ खनिजों का प्रदेश नहीं, बल्कि वैश्विक संस्कृति का मार्गदर्शक है। हमारी सरकार हर शिल्पकार की आजीविका को अंतरराष्ट्रीय पंख देगी।”
— श्री विष्णुदेव साय, मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़
🎨 कैसे आकार लेती है बस्तर की यह ‘दैवीय कृति’?
यह कलाकृति पीतल की नहीं, बस्तर के आदिवासियों के लोक-विश्वास और प्रकृति के प्रति समर्पण की पिघली हुई गाथा है:
- मिट्टी का गर्भ: सबसे पहले स्थानीय पवित्र मिट्टी से एक आधार तैयार होता है।
- मधुमक्खियों का धागा: शुद्ध मधुमक्खी के मोम को बारीक तारों में बदलकर मिट्टी पर कलात्मक आकृतियां उकेरी जाती हैं।
- अग्नि परीक्षा: इसके बाद इसे दोबारा मिट्टी से ढंककर धधकती भट्टी में तपाया जाता है। मोम पिघलकर रास्ता छोड़ता है और उसकी जगह खौलता हुआ पीतल समा जाता है।
- सृजन का उदय: अंत में जब बाहरी मिट्टी की परत को तोड़ा जाता है, तो भीतर से साक्षात ‘ट्री ऑफ लाइफ’ मुस्कुराता हुआ बाहर आता है।
🚀 महा-असर: बस्तर के जंगलों से ग्लोबल मार्केट्स तक मचेगी धूम
प्रधानमंत्री मोदी के इस एक मास्टरस्ट्रोक ने छत्तीसगढ़ के आर्थिक और सांस्कृतिक भविष्य को बदल कर रख दिया है:
- ‘ब्रांड छत्तीसगढ़’ की ग्लोबल गूंज: अब दुनिया भर के बड़े म्यूजियम, आर्ट गैलरी और अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट घराने बस्तर के ढोकरा शिल्प के लिए कतार में खड़े नजर आएंगे।
- आदिवासी इकॉनमी को पंख: इस ऐतिहासिक पब्लिसिटी से बिचौलियों का अंत होगा। बस्तर के सुदूर अंचलों में बैठे कलाकारों को उनके हुनर की सही कीमत सीधे डॉलर और पाउंड में मिल सकेगी।
- सतत विकास (Sustainable Living) का संदेश: जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, छत्तीसगढ़ की यह 100% ईको-फ्रेंडली और प्राकृतिक कला दुनिया को सिखा रही है कि प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना भी सर्वश्रेष्ठ सृजन किया जा सकता है।
उपसंहार:
बस्तर की ‘ढोकरा ट्री ऑफ लाइफ’ आज महज़ एक कूटनीतिक भेंट नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की अस्मिता का वह ‘वैश्विक राजदूत’ बन चुकी है, जिसने सात समंदर पार न्यूज़ीलैंड के राजकीय भवन में छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान का परचम लहरा दिया है। यह छत्तीसगढ़ के कला-पुजारियों की वह विजय है, जिसकी गूंज सदियों तक सुनी जाएगी!
