सरकारी मदद से बंजर जमीन पर लह लहाई फसल; सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना कुदारीडीह
प्रगतिशील किसान मनोज यादव ने आपदा को बदला अवसर में, ओलावृष्टि के बाद भी कमाया ₹1.5 लाख का शुद्ध मुनाफा
विशेष संवाददाता
रायपुर/मैनपाट, 15 जुलाई 2026
छत्तीसगढ़ के ‘शिमला’ के रूप में विश्व विख्यात पर्यटन स्थल मैनपाट अब न सिर्फ अपनी वादियों, बल्कि ‘एग्री-टूरिज्म’ (कृषि पर्यटन) के एक नए वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है। यहाँ की सर्द और अनुकूल जलवायु के साथ-साथ राज्य शासन के उद्यानिकी विभाग की दूरदर्शी नीतियों ने स्थानीय किसानों की तकदीर बदल दी है। पारंपरिक खेती के रूढ़िवादी ढर्रे को छोड़कर यहाँ के प्रगतिशील किसान अब फलोद्यान (बागवानी) की ओर रुख कर रहे हैं और सफलता की एक नई इबारत लिख रहे हैं।

ऐसी ही एक प्रेरक और पथप्रदर्शक सफलता की कहानी मैनपाट के ग्राम बारिमा निवासी कृषक मनोज यादव की है। मनोज ने अपनी मेहनत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ग्राम कुदारीडीह (मेहता पॉइंट के समीप) में नाशपाती का एक ऐसा समृद्ध बागान तैयार किया है, जो आज पूरे प्रदेश के किसानों के लिए रोल मॉडल बन चुका है।
सरकारी मदद से बंजर गोड़ा जमीन पर खड़े किए 170 फलदार वृक्ष
कृषक मनोज यादव ने अपनी इस यात्रा के बारे में बताते हुए कहा कि वर्ष 2017-18 उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। उन्होंने मैनपाट के कमलेश्वरपुर स्थित शासकीय उद्यान रोपणी से नाशपाती के उन्नत किस्म के पौधे हासिल किए थे। मनोज ने अपनी 0.500 हेक्टेयर ‘गोड़ा जमीन’ (पठारी और पथरीली खाली भूमि), जिसे अमूमन अनुपयोगी माना जाता है, उस पर लगभग 200 पौधे रोपे।

शुरुआती दौर में प्राकृतिक थपेड़ों के कारण कुछ पौधे नष्ट जरूर हुए, लेकिन मनोज ने हिम्मत नहीं हारी। उद्यानिकी विभाग के कमलेश्वरपुर कार्यालय के अधिकारियों-कर्मचारियों ने समय-समय पर बागान का निरीक्षण किया। खाद की सटीक मात्रा से लेकर पौधों के वैज्ञानिक रखरखाव और बीमारियों से बचाव के लिए निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया। इसी का परिणाम है कि आज उनके बागान में 170 पेड़ पूरी तरह से फल दे रहे हैं।
आंकड़ों की नजर में मनोज यादव की सफलता
| विवरण | आंकड़े / कमाई |
|---|---|
| कुल रकबा | 0.500 हेक्टेयर (गोड़ा जमीन) |
| वर्तमान में फलदार वृक्ष | 170 पेड़ |
| इस सीजन का थोक उत्पादन | 2.5 पिकअप (लगभग 260 कैरेट) |
| थोक बाजार से आय | ₹1,30,000 (₹500 प्रति कैरेट की दर से) |
| रिटेल व पर्यटकों से आय | ₹25,000 से ₹30,000 |
| इस वर्ष का शुद्ध मुनाफा | ₹1.5 लाख (ओलावृष्टि के बावजूद) |
| पिछले वर्ष का बंपर मुनाफा | ₹2.5 से ₹3 लाख |
मौसम की मार भी नहीं डिगा सकी हौसला, कमाया बंपर मुनाफा
इस वर्ष का सीजन किसानों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहा। बेमौसम ओलावृष्टि और बाजार में आवक की देरी के कारण फसलों को काफी नुकसान पहुँचा, लेकिन मनोज के बागान की उन्नत गुणवत्ता ने बाजार में बाजी मार ली। थोक बाजार में उनकी नाशपाती 500 रुपये प्रति कैरेट की दर से हाथों-हाथ बिकी, जिससे उन्हें ₹1,30,000 की आय हुई। इसके अलावा, बागान घूमने आने वाले पर्यटकों को सीधे फल बेचकर उन्होंने ₹30,000 तक की अतिरिक्त कमाई की।
”पिछले साल मौसम अनुकूल था, तो इसी बागान से 3 लाख रुपये तक की कमाई हुई थी। इस बार ओलावृष्टि हुई, फिर भी नाशपाती ने घाटा नहीं होने दिया और डेढ़ लाख का शुद्ध मुनाफा मिला। यह पारंपरिक खेती से कई गुना बेहतर है।”
– मनोज यादव, प्रगतिशील किसान
बिचौलियों का खेल खत्म: एग्री-टूरिज्म का हॉटस्पॉट बना ‘कुदारीडीह’
मनोज यादव का यह बागान अब सिर्फ फसल उगाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह मैनपाट आने वाले सैलानियों के लिए ‘मस्ट विजिट’ डेस्टिनेशन बन गया है। लालमाटी के नाम से मशहूर इस खूबसूरत पठार से रायगढ़ क्षेत्र का विहंगम और मनोरम दृश्य दिखाई देता है। यहाँ रोजाना 100 से 250 पर्यटक पहुँच रहे हैं।
यहाँ आने वाले पर्यटक न केवल 50 से 100 रुपये प्रति किलो की दर से ताजी और रसीली नाशपाती खरीद रहे हैं, बल्कि खुद अपने हाथों से पेड़ों से फल तोड़ने का ‘फार्म-टू-टेबल’ का रोमांचक अनुभव भी ले रहे हैं। पर्यटकों के इस सीधे जुड़ाव ने बिचौलियों (मिडलमैन) की भूमिका को पूरी तरह समाप्त कर दिया है, जिससे किसानों को उनकी उपज का शत-प्रतिशत वास्तविक मूल्य मिल रहा है।
युवाओं और किसानों के लिए बने ‘यूथ आइकॉन’
मनोज यादव आज क्षेत्र के युवाओं और उन किसानों के लिए मिसाल बन चुके हैं जो रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं। उन्होंने अपील की है कि किसान अपनी खाली पड़ी अनुपयोगी भूमि पर नाशपाती, लीची और अन्य फलदार पौधों की बागवानी अपनाएं। पर्यटन क्षेत्रों के पास होने के कारण उपभोक्ताओं को सीधे फसल बेचकर कम लागत में भी बंपर मुनाफा कमाया जा सकता है।
जिला प्रशासन और उद्यानिकी विभाग की संयुक्त टीमें वनांचल और ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मुस्तैदी से जुटी हुई हैं। मनोज यादव की यह सफलता प्रत्यक्ष प्रमाण है कि अगर वैज्ञानिक मार्गदर्शन के साथ कड़ी मेहनत और सरकारी योजनाओं का सही फ्यूजन (मेल) हो, तो बागवानी को सबसे मुनाफे वाले बिजनेस में बदला जा सकता है।
