छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक छटा से सजेगा राष्ट्रपति भवन, बस्तर की माटी और परंपरा का होगा राष्ट्रीय सम्मान

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक छटा से सजेगा राष्ट्रपति भवन, बस्तर की माटी और परंपरा का होगा राष्ट्रीय सम्मान

बस्तर पंडुम-2026: राष्ट्रपति भवन तक पहुँची बस्तर की गौरवगाथा, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु करेंगी विजेताओं और पारंपरिक प्रमुखों का सम्मान

  • मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में 209 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल 30 जुलाई को राष्ट्रपति भवन में करेगा शिष्टाचार भेंट
  • उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा और संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल भी रहेंगे शामिल; बस्तर के कलाकारों और मांझी-चालकी के सम्मान में राष्ट्रपति भवन में विशेष भोज का आयोजन
  • 32 विकासखंडों के 54 हजार से अधिक कलाकारों ने दिखाई अपनी प्रतिभा, 12 सांस्कृतिक विधाओं में निखरी जनजातीय धरोहर
    रायपुर / जगदलपुर 27 जुलाई :
    छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, जीवंत लोकपरंपराओं और सदियों पुरानी धरोहर के लिए 30 जुलाई का दिन इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से दर्ज होने जा रहा है। बस्तर की माटी की सोंधी महक और वहाँ की लोककला अब देश के सबसे बड़े संवैधानिक प्रांगण—’राष्ट्रपति भवन’ को सुवासित करेगी। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य का 209 सदस्यीय उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल आगामी 30 जुलाई को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु से शिष्टाचार भेंट करेगा।
    इस ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रपति मुर्मु ‘बस्तर पंडुम-2026’ के विजेता कलाकारों, परगना मांझी, मांझी, चालकी, पारंपरिक जनजातीय प्रमुखों तथा पद्मश्री से सम्मानित राज्य की महान विभूतियों का अभिनंदन करेंगी।

राष्ट्रपति भवन में विशेष भोज और राष्ट्रीय स्थलों का भ्रमण

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने इस अवसर को अविस्मरणीय बनाते हुए बस्तर के कलाकारों, पारंपरिक प्रतिनिधियों और पद्मश्री पुरस्कार विजेताओं के सम्मान में विशेष भोज (स्पेशल डिनर) का आयोजन किया है।
प्रतिनिधिमंडल न केवल राष्ट्रपति भवन के गौरवमयी इतिहास का अवलोकन करेगा, बल्कि नई दिल्ली के प्रमुख राष्ट्रीय स्थलों का भ्रमण भी करेगा। बस्तर के इतिहास में यह पहला अवसर है जब इतनी बड़ी संख्या में जनजातीय समुदाय के पारंपरिक नेतृत्वकर्ता और स्थानीय कलाकार एक साथ देश के सर्वोच्च संवैधानिक मंच पर सम्मानित होने जा रहे हैं।

“यह पूरे प्रदेश के सांस्कृतिक स्वाभिमान का सम्मान” — मुख्यमंत्री साय

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा:
“हमारी सरकार जनजातीय समाज की गौरवशाली विरासत, पारंपरिक ज्ञान और लोककला के संरक्षण व संवर्धन के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। राष्ट्रपति भवन में बस्तर के लोककलाकारों और हमारी पारंपरिक नेतृत्व व्यवस्था के प्रतिनिधियों की उपस्थिति पूरे छत्तीसगढ़ के लिए अत्यंत गर्व और गौरव का विषय है। यह सम्मान केवल कलाकारों का नहीं, बल्कि बस्तर की पावन संस्कृति और समूचे जनजातीय समाज के प्रति भारत का सम्मान है।”

संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल ने कहा:
“बस्तर पंडुम ने यह सिद्ध कर दिया है कि छत्तीसगढ़ की लोककलाओं में विश्व पटल पर छा जाने का सामर्थ्य है। राष्ट्रपति भवन में हमारे कलाकारों का सम्मान छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक स्वाभिमान की पुनर्प्रतिष्ठा है।”

गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स से लेकर 12 विधाओं का भव्य विस्तार

वर्ष 2025 में पहली बार आयोजित ‘बस्तर पंडुम’ ने दुनिया के सबसे बड़े जनजातीय सांस्कृतिक महोत्सव के रूप में ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में नाम दर्ज कराकर इतिहास रचा था। वर्ष 2026 में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मार्गदर्शन में इस महोत्सव को और अधिक व्यापक रूप दिया गया:

  • प्रतिभागियों की ऐतिहासिक भागीदारी: बस्तर संभाग के 7 जिलों और 32 विकासखंडों से रिकॉर्ड 54,750 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
  • 7 से बढ़कर 12 हुईं विधाएं: पहले जहाँ 7 विधाओं में स्पर्धाएँ होती थीं, वहीं इस वर्ष दायरा बढ़ाकर 12 विधाएँ (जनजातीय नृत्य, लोकगीत, नाट्य, पारंपरिक वाद्ययंत्र, वेशभूषा, आभूषण, शिल्प, चित्रकला, पारंपरिक पेय, पारंपरिक व्यंजन, आंचलिक साहित्य और वन-औषधि ज्ञान) कर दिया गया।
  • त्रिस्तरीय प्रतियोगिताएँ: 10 जनवरी से 9 फरवरी 2026 तक जनपद, जिला और संभाग स्तर पर प्रतियोगिताओं का भव्य आयोजन हुआ।

दिग्गजों की उपस्थिति और राष्ट्रीय सांस्कृतिक संगम

जगदलपुर में आयोजित संभाग स्तरीय समारोह का शुभारंभ स्वयं राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने किया था, जबकि समापन समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह की गरिमामयी मौजूदगी ने इस आयोजन को राष्ट्रीय पहचान दी।
इस महोत्सव में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और मध्य प्रदेश के कलाकारों ने भी सहभागिता की, जिससे बस्तर पंडुम एक ‘राष्ट्रीय सांस्कृतिक संगम’ के रूप में उभरा। आयोजन ने न केवल कला को मंच दिया, बल्कि स्थानीय शिल्पकारों, स्व-सहायता समूहों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए आर्थिक समृद्धि के द्वार भी खोले।
30 जुलाई को राष्ट्रपति भवन में होने वाला यह सम्मान बस्तर के स्वाभिमान, उसकी अनूठी परंपरा और भारत की बहुरंगी जनजातीय अस्मिता का ऐतिहासिक उत्सव साबित होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *