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रायपुर/नई दिल्ली 29 जुलाई :
छत्तीसगढ़ के जनजातीय बहुल बस्तर अंचल की प्राचीन संस्कृति, परंपरा और स्वाभिमान का एक नया और गौरवशाली अध्याय कल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लिखा जाएगा। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के विशेष मार्गदर्शन और नेतृत्व में बस्तर क्षेत्र के पारंपरिक प्रशासनिक एवं सामाजिक प्रहरियों—माझी, चालकी और मुरिया समाज के प्रतिनिधिमंडल की देश की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से ऐतिहासिक शिष्टाचार भेंट होगी। यह मुलाकात न केवल बस्तर के आदिवासी समाज के लिए बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ राज्य के लिए अत्यंत गौरव का क्षण है, जहाँ देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन राष्ट्रपति के समक्ष बस्तर की माटी की खुशबू, उसकी समृद्ध सांस्कृतिक थाती और जनजातीय परंपराओं का सीधा प्रतिनिधित्व देखने को मिलेगा।

माझी, चालकी और मुरिया: बस्तर की सांस्कृतिक और प्रशासनिक रीढ़
बस्तर की आबोहवा में रचे-बसे माझी, चालकी और मुरिया समुदाय सिर्फ समाज के अंग नहीं हैं, बल्कि वे बस्तर की उस प्राचीन लोकतांत्रिक और ग्राम-शासन व्यवस्था के मुख्य स्तंभ हैं, जिसने सदियों से अपनी अनूठी संस्कृति और जंगलों की रक्षा की है:
- माझी (गाँव या परगना के प्रमुख): माझी समाज के वे प्रबुद्ध और न्यायप्रिय मुखिया होते हैं, जो पारंपरिक रीति-रिवाजों, सामाजिक न्याय और परगना की व्यवस्था का सफलतापूर्वक संचालन करते हैं।
- चालकी (सहयोगी एवं सलाहकार): माझी के प्रमुख सहयोगी के रूप में चालकी प्रशासनिक और सांस्कृतिक निर्णयों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो सामूहिकता और भाईचारे का संदेश देते हैं।
- मुरिया समुदाय: अपनी विशिष्ट जीवनशैली, विश्वप्रसिद्ध ‘घोटुल’ प्रणाली, कला, लोक-नृत्य और प्रकृति प्रेम के लिए पहचाने जाने वाला मुरिया समाज बस्तर की आत्मा का प्रतीक है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की दूरदर्शी और संवेदनशील पहल
छत्तीसगढ़ की कमान संभालने के बाद से ही मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने बस्तर के विकास, शांति, सुरक्षा और वहां की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण को अपनी प्राथमिकताओं में सर्वोच्च स्थान दिया है। उनका स्पष्ट मानना है कि बस्तर का वास्तविक विकास तभी संभव है जब वहाँ की पारंपरिक जड़ों और रीति-रिवाजों का सम्मान करते हुए आदिवासियों को विकास का मुख्य साझीदार बनाया जाए।
माझी, चालकी और मुरिया समाज के प्रतिनिधियों को राष्ट्रपति भवन तक पहुँचाने की यह पहल मुख्यमंत्री श्री साय के उस संवेदनशील और समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें वे छत्तीसगढ़ के अंतिम छोर पर बैठे जनजातीय जननायक की आवाज को सीधे देश के शीर्ष नेतृत्व तक पहुँचाना चाहते हैं।
संपादकीय / विशेष टिप्पणी: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आदिवासी अस्मिता का जीवंत दस्तावेज
“बस्तर केवल भौगोलिक रूप से छत्तीसगढ़ का एक हिस्सा नहीं है, बल्कि यह भारत की उस आदि-संस्कृति का जीवंत प्रमाण है जिसने प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीना सिखाया है। कल दिल्ली में होने जा रही यह मुलाकात महज़ एक शिष्टाचार भेंट नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की उस महान खूबसूरती का प्रतीक है जहाँ हाशिए पर माने जाने वाले समाज के लोक-रक्षक देश के सर्वोच्च संवैधानिक भवन के केंद्र में सुशोभित होते हैं।”
क्यों मील का पत्थर है यह मुलाकात?
- मुख्यधारा और परंपरा का अद्भुत समन्वय: सदियों से अपनी स्वायत्त सांस्कृतिक पहचान को सहेजे रखने वाले माझी, चालकी और मुरिया समाज का राष्ट्रपति भवन पहुँचना इस बात का प्रमाण है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनी विविधता पर कितना गर्व करती है।
- विश्वास की बहाली और संवाद का नया युग: बस्तर वह क्षेत्र रहा है जो कभी नक्सलवाद के साए में अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहा था। ऐसे में वहाँ के पारंपरिक प्रहरियों का देश के सर्वोच्च पद से संवाद करना यह सिद्ध करता है कि क्षेत्र में शांति, विश्वास और विकास की बयार अब सुदूर गाँवों तक पहुँच चुकी है।
- सांस्कृतिक स्वाभिमान का राष्ट्रीय सम्मान: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार ने यह साबित कर दिया है कि जनजातीय संस्कृति का संरक्षण केवल सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय फलक पर सर्वोच्च सम्मान दिलाना ही सच्ची लोक-सेवा है।
कल जब ये प्रतिनिधि अपनी पारंपरिक वेशभूषा और विशिष्ट लोक-संस्कृति के साथ महामहिम राष्ट्रपति से मिलेंगे, तो यह पल केवल छत्तीसगढ़ के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के सांस्कृतिक इतिहास में एक स्वर्णिम पृष्ठ के रूप में दर्ज हो जाएगा। यह इस बात की घोषणा होगी कि बस्तर अब बदल रहा है, अपनी मूल जड़ों और आत्मसम्मान के साथ देश के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है।
