बस्तर में बागवानी की नई क्रांति: वैज्ञानिकों की 9 साल की मेहनत रंग लाई, पहली बार झूम उठी लीची की फसल
जगदलपुर, 07 मई 2026
बस्तर में बागवानी की नई क्रांति: वैज्ञानिकों की 9 साल की मेहनत रंग लाई, पहली बार झूम उठी लीची की फसल
बस्तर, जिसे अब तक केवल घने जंगलों और पारंपरिक खेती के लिए जाना जाता था, अब अपनी एक नई पहचान गढ़ रहा है। महात्मा गाँधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित क्रांतिकारी डेब्रिधुर उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, जगदलपुर के वैज्ञानिकों ने कृषि क्षेत्र में एक बड़ा इतिहास रच दिया है। लगभग एक दशक की कड़ी मेहनत के बाद बस्तर की धरती पर पहली बार लीची के पौधों में सफल फलन हुआ है।

2016 में बोया गया था सफलता का बीज
इस ऐतिहासिक उपलब्धि की नींव वर्ष 2016-17 में रखी गई थी। तत्कालीन वैज्ञानिक डॉ. गणेश प्रसाद नाग ने एक साहसिक प्रयोग करते हुए अंबिकापुर अनुसंधान केंद्र से लीची की उन्नत किस्में मंगवाईं और उन्हें जगदलपुर के महाविद्यालय प्रक्षेत्र में रोपित किया। उस समय बस्तर की गर्म और आर्द्र जलवायु में लीची की खेती को एक बड़ी चुनौती माना जा रहा था, क्योंकि यहाँ इसके उत्पादन का कोई पिछला उदाहरण मौजूद नहीं था।

इन 5 प्रमुख किस्मों ने दिखाया दम
अनुसंधान केंद्र में लीची की पाँच सबसे बेहतरीन किस्मों पर शोध किया गया, जिनमें शामिल हैं:
- इंद्रा लीची-2
- अंबिका लीची-1
- चाइना
- शाही
- रोज सेंटेड
प्रक्षेत्र में लगाए गए इन 40 पौधों की वृद्धि और जलवायु अनुकूलन पर वैज्ञानिकों ने 09 वर्षों तक निरंतर निगरानी रखी।
वैज्ञानिक प्रबंधन से मिली सफलता
फल विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक डॉ. रामकुमार देवांगन के नेतृत्व में इन पौधों पर विशेष शोध किया गया। उन्होंने लीची की खेती में आने वाली प्रमुख बाधाओं जैसे पुष्पों का गिरना, ‘फ्रूट क्रैकिंग’ (फलों का फटना), ट्रेनिंग-प्रूनिंग और बेहतर पौध संवर्धन पर वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल किया। इसी का नतीजा है कि आज इन पेड़ों पर रसीले फलों की भरपूर पैदावार देखने को मिल रही है।
बाजार और मूल्य संवर्धन की तैयारी
वैज्ञानिकों का लक्ष्य केवल फसल उगाना ही नहीं, बल्कि इसे किसानों की आय का जरिया बनाना भी है। डॉ. भागवत कुमार भगत इस दिशा में काम कर रहे हैं कि कैसे लीची से जूस, जैली और अन्य मूल्य संवर्धित उत्पाद (Value Added Products) तैयार कर इसे बाजार से जोड़ा जाए।
किसानों के लिए खुले समृद्धि के द्वार
इस सफलता ने बस्तर के किसानों के लिए उम्मीद की एक नई किरण जगा दी है। अब तक बस्तर के किसान केवल धान या मोटे अनाज पर निर्भर थे, लेकिन अब वे लीची जैसी नकदी फसल (Cash Crop) अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इसे व्यावसायिक स्तर पर अपनाया जाए, तो बस्तर आने वाले समय में छत्तीसगढ़ का नया ‘लीची हब’ बन सकता है।
