रायपुर /सुकमा 20 मई : नक्सलवाद और बीहड़ जंगलों को मात देकर सुकमा के ‘मिनपा’ में स्वास्थ्य क्रांति, 7 गांवों के ग्रामीणों के लिए जीवनदायिनी बना नया उप स्वास्थ्य केंद्र
सुकमा जिले का धुर नक्सल प्रभावित मिनपा क्षेत्र, जो कभी घने जंगलों, दुर्गम रास्तों और लाल आतंक के साए के कारण विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर था, आज स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश कर रहा है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के कुशल नेतृत्व और राज्य सरकार की जनहितकारी प्राथमिकताओं के चलते इस अंचल की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। एक समय जहां बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लोग तरसते थे, आज वहां अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की बयार बह रही है।

झोपड़ी से शुरू हुआ सफर, अब बना सर्वसुविधायुक्त केंद्र
एक दौर ऐसा भी था जब मिनपा में स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना किसी चुनौती से कम नहीं था। संसाधनों की भारी कमी के बीच एक छोटी सी झोपड़ी से इलाज का सिलसिला शुरू किया गया था। विपरीत हालातों और भौगोलिक चुनौतियों के बाद भी स्वास्थ्य विभाग के जांबाज कर्मचारियों ने हार नहीं मानी।

साल 2024 में साय सरकार के प्रयासों से यहां एक भव्य और आधुनिक उप स्वास्थ्य केंद्र भवन का निर्माण किया गया। आज इस नए केंद्र में न केवल आधुनिक चिकित्सकीय उपकरण मौजूद हैं, बल्कि एक सुसज्जित प्रयोगशाला (लैब) कक्ष और आवश्यक मेडिकल स्टाफ की तैनाती भी की गई है।
7 सुदूर गांवों के 3500 से अधिक लोगों को मिल रहा नया जीवन
यह नया उप स्वास्थ्य केंद्र अब केवल एक सरकारी इमारत नहीं, बल्कि इस क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी संजीवनी बन चुका है। इस केंद्र के माध्यम से मिनपा सहित आस-पास के 7 बड़े और दूरस्थ गांवों—दुलेड़, एलमागुंडा, भटपाड़, पोट्टेमडगू, टोंडामरका और गुंडराजपाड़ के लगभग 3,593 ग्रामीणों को उनके घर के पास ही गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल रहा है।

बीहड़ों में ‘नाईट कैंप’: स्वास्थ्य कर्मियों का अनुकरणीय समर्पण
इस पूरी सफलता के पीछे स्वास्थ्य योद्धाओं की कड़ी मेहनत और अद्वितीय समर्पण है। पोट्टेमडगू, दुलेड़, गुंडराजपाड़ और भाटपाड़ जैसे पूरी तरह पहुंचविहीन और संवेदनशील गांवों तक पहुंचने के लिए इन कर्मचारियों को आज भी मीलों लंबे घने जंगलों और पथरीले रास्तों को पैदल पार करना पड़ता है।
अक्सर दूरी और कठिन रास्तों की वजह से स्वास्थ्य कर्मियों का एक ही दिन में लौट पाना मुमकिन नहीं होता। ऐसे में ये जांबाज कर्मचारी पीछे हटने के बजाय उन्हीं अंदरूनी गांवों में रात गुजारते हैं। गांवों में विशेष ‘नाईट कैंप’ (रात्रि शिविर) लगाकर रात के अंधेरे में भी बीमार मरीजों का मुस्तैदी से उपचार किया जा रहा है। साथ ही, लगातार लग रहे शिविरों से अब ग्रामीणों में बीमारियों को लेकर जागरूकता भी बढ़ी है।

बदल रहे हैं आंकड़े: संस्थागत प्रसव पर बढ़ा भरोसा
कर्मचारियों के इसी सेवाभाव का नतीजा है कि अब अस्पताल को लेकर ग्रामीणों का डर और हिचक खत्म हो चुकी है। वर्तमान में:
- ओपीडी (OPD): मिनपा उप स्वास्थ्य केंद्र में प्रतिदिन औसतन 15 से 20 ग्रामीण अपना इलाज कराने पहुंच रहे हैं।
- सुरक्षित प्रसव: इस सुदूर अंचल में हर महीने औसतन 4 सुरक्षित और संस्थागत प्रसव (Institutional Deliveries) कराए जा रहे हैं।
कभी प्रसव के लिए पारंपरिक और असुरक्षित तरीकों पर निर्भर रहने वाले ये आदिवासी परिवार अब सरकारी स्वास्थ्य तंत्र पर पूरा भरोसा जता रहे हैं। मिनपा क्षेत्र का यह बदलाव बस्तर के बदलते स्वरूप और विकास की एक सुखाद और प्रेरणादायक तस्वीर पेश करता है।
