जनजातीय गरिमा उत्सव: सारंगढ़ मेले में झारा और बेलमेटल उत्पादों का जलवा

सारंगढ़ 24 मई । सारंगढ़ में ‘जनजातीय गरिमा उत्सव’ का भव्य आयोजन: हस्तशिल्प मेले में झारा शिल्प और बेलमेटल उत्पादों ने बिखेरी चमक

जनजातीय संस्कृति, समृद्ध परंपरा और पारंपरिक शिल्प को वैश्विक मंच प्रदान करने के उद्देश्य से स्थानीय साहू धर्मशाला में ‘जनजातीय गरिमा उत्सव’ के अंतर्गत एक भव्य हस्तनिर्मित (हैंडीक्राफ्ट) वस्तु प्रदर्शनी सह विक्रय मेले का आयोजन किया गया। ट्राइबल कोऑपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ट्राइफेड) द्वारा आयोजित इस मेले में जिला सारंगढ़-बिलाईगढ़ के जनजातीय कारीगरों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपने उत्कृष्ट हुनर का जीवंत प्रदर्शन किया।

आकर्षण का केंद्र रहे झारा शिल्प और बेलमेटल उत्पाद

इस विशेष प्रदर्शनी में विशेष रूप से ग्राम बैगीनडीह के शिल्पकारों द्वारा तैयार किए गए झारा शिल्प और बेलमेटल (घंटी धातु) के उत्पाद ग्राहकों और आगंतुकों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र रहे। पीतल और कांसे की जुगलबंदी से बनी मूर्तियां, सजावटी सामान और पारंपरिक बर्तनों की चमक ने लोगों को बेहद आकर्षित किया। मेले में पहुंचे नागरिकों ने कारीगरों की कला की जमकर सराहना की और बड़े पैमाने पर उत्पादों की खरीदारी की।

‘बिहान’ के स्व-सहायता समूहों से सशक्त हो रहीं महिला शिल्पकार

इस प्रदर्शनी की सबसे खास बात यह रही कि इसमें शामिल होने वाली अधिकांश शिल्पकार महिलाएं थीं। ये महिलाएं पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के राष्ट्रीय आजीविका मिशन (बिहान) के अंतर्गत गठित ‘कात्यायनी’ और ‘भारत माता’ जैसे स्व-सहायता समूहों (SHGs) से जुड़ी हुई हैं। इन समूहों के माध्यम से ग्रामीण और जनजातीय महिलाएं संगठित होकर अपने पारंपरिक हुनर को आजीविका का एक मजबूत और आत्मनिर्भर जरिया बना रही हैं।

ट्राइफेड बदलेगा शिल्प ग्रामों की तकदीर

विशेषज्ञों और अधिकारियों का मानना है कि सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बैगीनडीह जैसे कई अन्य शिल्प ग्रामों के कारीगर यदि ट्राइफेड (TRIFED) के साथ सीधे जुड़ते हैं, तो उनके जीवन स्तर में बड़ा सकारात्मक सुधार आ सकता है। ट्राइफेड इन कारीगरों को न केवल सही मंच देता है, बल्कि उनके उत्पादों को सही बाजार मूल्य दिलाने में भी मदद करता है।

वनधन निर्माता कंपनियों से मजबूत होगा जनजातीय व्यापार

ट्राइफेड ने देश और राज्य स्तर पर 50 से 100 राज्य स्तरीय निर्माता कंपनियों के माध्यम से ‘वनधन माइक्रो उद्यमों’ को बढ़ावा देने के लिए बड़े कदम उठाए हैं। इन वनधन निर्माता कंपनियों के गठन के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े उद्देश्य तय किए गए हैं:

  1. उत्पादकता में वृद्धि और लागत में कमी: आधुनिक तकनीकों और प्रशिक्षण के जरिए कारीगरों की कार्यक्षमता बढ़ाना ताकि लागत कम हो सके।
  2. प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन (Value Addition): कुशल एकत्रीकरण के जरिए बड़े पैमाने पर उत्पादों का प्रसंस्करण (Processing) करना, जिससे उत्पादों की गुणवत्ता और कीमत बेहतर हो सके।
  3. कुशल विपणन (Marketing): जनजातीय उत्पादों को बड़े बाजारों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़कर उनका बेहतर उपयोग और कुशल विपणन सुनिश्चित करना।

इस मेले ने यह साबित कर दिया है कि यदि ग्रामीण हुनर को सही दिशा और प्रोत्साहन मिले, तो वे न केवल अपनी संस्कृति को जीवित रख सकते हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सकते हैं।

सारंगढ़। जनजातीय संस्कृति, समृद्ध परंपरा और पारंपरिक शिल्प को वैश्विक मंच प्रदान करने के उद्देश्य से स्थानीय साहू धर्मशाला में ‘जनजातीय गरिमा उत्सव’ के अंतर्गत एक भव्य हस्तनिर्मित (हैंडीक्राफ्ट) वस्तु प्रदर्शनी सह विक्रय मेले का आयोजन किया गया। ट्राइबल कोऑपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ट्राइफेड) द्वारा आयोजित इस मेले में जिला सारंगढ़-बिलाईगढ़ के जनजातीय कारीगरों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपने उत्कृष्ट हुनर का जीवंत प्रदर्शन किया।

आकर्षण का केंद्र रहे झारा शिल्प और बेलमेटल उत्पाद

इस विशेष प्रदर्शनी में विशेष रूप से ग्राम बैगीनडीह के शिल्पकारों द्वारा तैयार किए गए झारा शिल्प और बेलमेटल (घंटी धातु) के उत्पाद ग्राहकों और आगंतुकों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र रहे। पीतल और कांसे की जुगलबंदी से बनी मूर्तियां, सजावटी सामान और पारंपरिक बर्तनों की चमक ने लोगों को बेहद आकर्षित किया। मेले में पहुंचे नागरिकों ने कारीगरों की कला की जमकर सराहना की और बड़े पैमाने पर उत्पादों की खरीदारी की।

‘बिहान’ के स्व-सहायता समूहों से सशक्त हो रहीं महिला शिल्पकार

इस प्रदर्शनी की सबसे खास बात यह रही कि इसमें शामिल होने वाली अधिकांश शिल्पकार महिलाएं थीं। ये महिलाएं पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के राष्ट्रीय आजीविका मिशन (बिहान) के अंतर्गत गठित ‘कात्यायनी’ और ‘भारत माता’ जैसे स्व-सहायता समूहों (SHGs) से जुड़ी हुई हैं। इन समूहों के माध्यम से ग्रामीण और जनजातीय महिलाएं संगठित होकर अपने पारंपरिक हुनर को आजीविका का एक मजबूत और आत्मनिर्भर जरिया बना रही हैं।

ट्राइफेड बदलेगा शिल्प ग्रामों की तकदीर

विशेषज्ञों और अधिकारियों का मानना है कि सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बैगीनडीह जैसे कई अन्य शिल्प ग्रामों के कारीगर यदि ट्राइफेड (TRIFED) के साथ सीधे जुड़ते हैं, तो उनके जीवन स्तर में बड़ा सकारात्मक सुधार आ सकता है। ट्राइफेड इन कारीगरों को न केवल सही मंच देता है, बल्कि उनके उत्पादों को सही बाजार मूल्य दिलाने में भी मदद करता है।

वनधन निर्माता कंपनियों से मजबूत होगा जनजातीय व्यापार

ट्राइफेड ने देश और राज्य स्तर पर 50 से 100 राज्य स्तरीय निर्माता कंपनियों के माध्यम से ‘वनधन माइक्रो उद्यमों’ को बढ़ावा देने के लिए बड़े कदम उठाए हैं। इन वनधन निर्माता कंपनियों के गठन के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े उद्देश्य तय किए गए हैं:

  1. उत्पादकता में वृद्धि और लागत में कमी: आधुनिक तकनीकों और प्रशिक्षण के जरिए कारीगरों की कार्यक्षमता बढ़ाना ताकि लागत कम हो सके।
  2. प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन (Value Addition): कुशल एकत्रीकरण के जरिए बड़े पैमाने पर उत्पादों का प्रसंस्करण (Processing) करना, जिससे उत्पादों की गुणवत्ता और कीमत बेहतर हो सके।
  3. कुशल विपणन (Marketing): जनजातीय उत्पादों को बड़े बाजारों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़कर उनका बेहतर उपयोग और कुशल विपणन सुनिश्चित करना।

इस मेले ने यह साबित कर दिया है कि यदि ग्रामीण हुनर को सही दिशा और प्रोत्साहन मिले, तो वे न केवल अपनी संस्कृति को जीवित रख सकते हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सकते हैं।

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