लाल किले पर गूंजा जनजातीय संस्कृति का गौरव, देश के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में आदिवासी विरासत का ऐतिहासिक उत्सव
विशेष संवाददाता
नई दिल्ली, 25 मई। राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक लाल किला मैदान रविवार को देश की प्राचीनतम जनजातीय संस्कृति के अनूठे रंगों में सराबोर हो उठा। जनजाति सुरक्षा मंच एवं जनजाति जागृति समिति द्वारा आयोजित भव्य जनजातीय सांस्कृतिक महोत्सव में देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रदर्शन किया गया। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की गरिमामयी उपस्थिति ने इस आयोजन को विशेष गौरव प्रदान किया। लाल किले की प्राचीर के साये में पारंपरिक वेशभूषा, लोक वाद्ययंत्रों की थाप और आदिवासी नृत्य शैलियों के प्रदर्शन ने उपस्थित जनसमुदाय को मंत्रमुग्ध कर दिया।

• लाल किला मैदान में जुटे देश भर के आदिवासी कलाकार, बिखरे संस्कृति के रंग
• राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का चयन जनजातीय समाज के बढ़ते प्रतिनिधित्व का प्रतीक
• छत्तीसगढ़ सरकार की पहल: गोंडी, हल्बी और सादरी भाषाओं में मिलेगी शिक्षा
आदिवासी समाज का कल्याण और सम्मान हमारी प्रतिबद्धता: अमित शाह
समारोह के मुख्य अतिथि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने संबोधन में जनजातीय समाज के गौरवशाली अतीत और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका की जमकर सराहना की। गृह मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार जनजातीय समाज के जल, जंगल, जमीन के अधिकारों की रक्षा और उनके सर्वांगीण विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
उन्होंने कहा, “आज देश में जनजातीय गौरव दिवस मनाकर भगवान बिरसा मुंडा जैसे महानायकों को वह सम्मान दिया जा रहा है, जिसके वे हकदार थे। देश की पहली जनजातीय महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी का चुना जाना इस बात का प्रमाण है कि आज नीति निर्धारण के सर्वोच्च स्तर पर जनजातीय समाज का प्रतिनिधित्व मजबूत हुआ है।” गृह मंत्री ने छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार की पीठ थपथपाते हुए कहा कि डबल इंजन की सरकार बस्तर से लेकर सरगुजा तक विकास की मुख्यधारा को आदिवासियों के घर-घर तक पहुंचा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुरक्षा और विकास के समन्वय से आज जनजातीय क्षेत्रों में अभूतपूर्व शांति और प्रगति का नया अध्याय लिखा जा रहा है।
जनजातीय जीवन दर्शन पर्यावरण संकट का वैश्विक समाधान: मुख्यमंत्री
समारोह को संबोधित करते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि जनजातीय समाज केवल प्रकृति का रक्षक नहीं है, बल्कि वह भारत की सांस्कृतिक आत्मा का सबसे प्राचीन और जीवंत स्वरूप है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सदियों से जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते हुए जनजातीय समाज ने प्रकृति और मानव जीवन के बीच एक आदर्श संतुलन बनाए रखने का कार्य किया है। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट और ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, तब जनजातीय जीवन दर्शन ही मानवता को टिकाऊ विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) का सही रास्ता दिखा सकता है।
मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे राज्य की मुख्य पहचान ही उसकी समृद्ध जनजातीय विरासत से है। छत्तीसगढ़ में 42 प्रकार की विविधतापूर्ण जनजातियां निवास करती हैं और राज्य का लगभग 44 प्रतिशत भूभाग वनों से आच्छादित है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राष्ट्र निर्माण तक जनजातीय समाज के अतुलनीय योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा और छत्तीसगढ़ के अमर शहीद वीर नारायण सिंह जैसे महानायकों ने अपनी संस्कृति, स्वाभिमान और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष और बलिदान का एक अद्वितीय इतिहास रचा है, जो आज भी हमें प्रेरणा देता है।
सांस्कृतिक और भाषाई संरक्षण के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के ऐतिहासिक कदम
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपनी सरकार की प्राथमिकताओं को साझा करते हुए बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और उनके मूल जीवन मूल्यों को संरक्षित करने के लिए पूरी निष्ठा के साथ निरंतर कार्य कर रही है। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदमों की विस्तृत जानकारी दी:
- राष्ट्रीय मंच प्रदान करना: नया रायपुर में आयोजित होने वाला ‘आदि परब’, बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे विशाल आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि ये जनजातीय खेल प्रतिभा, परंपरा और विशिष्ट पहचान को राष्ट्रीय व वैश्विक मंच देने का एक दृढ़ प्रयास हैं।
- मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा: किसी भी समाज की संस्कृति को जीवित रखने में उसकी भाषा की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। इसके लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने गोंडी, हल्बी और सादरी जैसी स्थानीय जनजातीय भाषाओं में बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा देने की दिशा में एक विशेष और दूरगामी पहल शुरू की है, ताकि नई पीढ़ी अपनी भाषाई व सांस्कृतिक जड़ों से मजबूती से जुड़ी रह सके।
- आस्था केंद्रों का कायाकल्प: बस्तर से लेकर सरगुजा संभाग तक जनजातीय समाज के पारंपरिक आस्था केंद्रों, जैसे देवगुड़ी और मातागुड़ी के संरक्षण, जीर्णोद्धार और विकास का कार्य बेहद तीव्र गति से किया जा रहा है।
भव्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन
कार्यक्रम के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से आए जनजातीय कलाकारों ने पारंपरिक लोक वाद्यों की धुनों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। लाल किला मैदान में पारंपरिक वेशभूषा में सजे नर्तक दलों और उनके पारंपरिक संगीत ने एक ऐसा वातावरण निर्मित किया, जिसने आधुनिक भारत के केंद्र में आदिम संस्कृति के गौरव को स्थापित कर दिया। इस अवसर पर विभिन्न जनजातीय संगठनों के पदाधिकारी, केंद्रीय मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारी और बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
