विशेष संवाददाता, रायपुर 3 जुलाई
बंदूक छोड़ी, विकास चुना: सुकमा के मड़कम भीमा कैसे बने मुख्यधारा की नई मिसाल
सुकमा की माटी में जहाँ कभी बारूद की गंध और खौफ का साया हुआ करता था, वहाँ अब बदलाव की एक नई बयार चल रही है। शासन की पुनर्वास नीति और जनकल्याणकारी योजनाएं बस्तर के युवाओं के हाथों से हथियार छीनकर उन्हें आत्मनिर्भरता का औजार थमा रही हैं। इसका सबसे जीता-जागता और प्रेरक चेहरा बनकर उभरे हैं कोंटा विकासखंड के ग्राम पंचायत पोलमपल्ली निवासी मड़कम भीमा।

कल तक भटकन और हिंसा की राह पर चलने वाले भीमा ने जब लोकतंत्र की मुख्यधारा को अपनाया, तो जिला प्रशासन और सुरक्षा बलों ने एक अभिभावक की तरह उनका हाथ थाम लिया। आज वे न सिर्फ सम्मान के साथ एक सामान्य नागरिक का जीवन जी रहे हैं, बल्कि पूरे अंचल के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुके हैं।
तेंदूपत्ते के साए से ‘पक्के मकान’ का सफर
मुख्यधारा में लौटने के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी पुनर्वास और स्थायित्व की। जिला प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए मड़कम भीमा को शासकीय योजनाओं से जोड़ा। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत उन्हें अपना खुद का पक्का घर बनाने के लिए आर्थिक सहायता स्वीकृत की गई।

आज भीमा का परिवार एक सुरक्षित और सम्मानजनक छत के नीचे सोता है। भीमा कहते हैं,
”कभी जंगलों में असुरक्षा के साए में कटी रातें याद आती हैं, तो आज इस पक्के घर की चौखट देखकर आंखें भर आती हैं। इस घर ने मेरे परिवार को स्थिरता और मुझे भविष्य के प्रति नया विश्वास दिया है।”
मनरेगा ने दी आर्थिक आजादी, बैंक खाते में आई मेहनत की कमाई
सिर्फ रहने को छत ही नहीं, बल्कि सम्मान से जीने के लिए भीमा को मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) के तहत रोजगार मुहैया कराया गया। भीमा ने किसी और के एजेंडे के लिए भटकने के बजाय, अपने ही गांव के विकास कार्यों में पसीना बहाना चुना।
जब मजदूरी की राशि सीधे उनके बैंक खाते में ट्रांसफर हुई, तो उनका आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुंच गया। आत्मनिर्भरता ने उन्हें यह अहसास कराया कि मेहनत की कमाई का गौरव क्या होता है।
एक नई सोच, एक नई जिंदगी
मड़कम भीमा की यह कहानी महज़ एक व्यक्ति के आत्मसमर्पण की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक सोच के बदलने की कहानी है। भीमा खुलकर मानते हैं कि शासन की पुनर्वास नीति और जिला प्रशासन के संवेनदनशील रवैये ने उन्हें एक नई पहचान और नया जीवन दिया है। अब उनका पूरा ध्यान अपने बच्चों की शिक्षा और परिवार के बेहतर भविष्य पर केंद्रित है।
भटके हुए युवाओं के लिए एक सीधा संदेश
बस्तर के जंगलों में आज भी जो युवा भटक रहे हैं, मड़कम भीमा की सफलता उनके लिए एक मौन लेकिन बेहद दमदार संदेश है। उनकी यह कहानी चीख-चीख कर कह रही है कि:
- हिंसा का रास्ता सिर्फ विनाश की ओर जाता है।
- शिक्षा, रोजगार और आत्मनिर्भरता ही सम्मान का असली मार्ग हैं।
- यदि कोई भी मुख्यधारा में लौटना चाहता है, तो शासन और प्रशासन पूरी मजबूती के साथ उसके स्वागत के लिए खड़ा है।
मड़कम भीमा आज सुकमा के उस बदलते चेहरे का प्रतीक हैं, जहाँ अब बंदूकों की गूंज नहीं, बल्कि विकास के गीत सुनाई दे रहे हैं।
