छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों में भ्रष्टाचार-लूट पर सरकार का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’, अब मनमर्जी करने वाले अफसरों पर गिरेगी सीधे गाज!

नगरीय निकायों में निर्माण कार्यों के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने जारी की कड़क गाइडलाइन: गड़बड़ी करने वाले अफसरों पर होगी सीधी कार्रवाई

रायपुर 9 जुलाई । छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों (नगर निगमों, पालिकाओं और नगर पंचायतों) में बरसों से जड़ जमाए बैठे भ्रष्टाचार, ठेकेदारों-अफसरों की जुगलबंदी, कागजी विकास और सालों-साल लटकने वाली परियोजनाओं के ‘काले साम्राज्य’ पर राज्य सरकार ने अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा प्रहार किया है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग की सचिव आर. शंगीता द्वारा जारी एक बेहद कड़क, ऐतिहासिक और फुलप्रूफ आदेश (क्रमांक GENS-21/1092/2026-UAD) ने पूरे प्रशासनिक गलियारे में भूचाल ला दिया है।

​यह महज एक विभागीय सर्कुलर नहीं, बल्कि जनता के पैसे की लूट मचाने वाले भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ सरकार का ‘डेथ वारंट’ है। इस आदेश के बाद अब अगर किसी भी कमिश्नर, सीएमओ (CMO) या इंजीनियर ने नियमों में रत्ती भर भी हेरफेर करने की कोशिश की, तो वे सीधे सस्पेंड होंगे और उनके खिलाफ कड़ी आपराधिक व अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

​🚫 खेल खत्म! भ्रष्ट तंत्र की कमर तोड़ने वाले 7 सबसे ‘कड़क’ नियम:

​1. नो विज़िट, नो एस्टीमेट: बिना ‘विवाद-मुक्त’ ज़मीन के कागज़ हिलाया तो खैर नहीं!

​अब तक का सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा यह होता था कि अधिकारी बिना मौके पर जाए दफ्तर के बंद कमरों में बैठकर करोड़ों का एस्टीमेट (प्राक्कलन) बना देते थे। बाद में पता चलता था कि जमीन पर कोर्ट केस है या वह किसी निजी व्यक्ति की है, जिससे काम सालों ठप रहता था और सरकारी पैसा फंस जाता था।

  • नया नियम: अब इंजीनियरों को अनिवार्य रूप से ‘स्थल निरीक्षण’ करना होगा। जमीन 100% विवाद-मुक्त होनी चाहिए, तभी फाइल आगे बढ़ेगी। एस्टीमेट में PWD के नवीनतम एसओआर (SOR) की तारीख का स्पष्ट उल्लेख करना होगा।

​2. वित्तीय शक्तियों का नया चाबुक: अफसरों और नेताओं के हाथ बांधे

​भ्रष्टाचार के विकेंद्रीकरण को रोकने के लिए तकनीकी और प्रशासकीय स्वीकृतियों के वित्तीय अधिकारों को बेहद कड़े दायरे में सीमित कर दिया गया है:

  • तकनीकी पावर पर ब्रेक: सहायक अभियंता सिर्फ 50 हजार, कार्यपालन अभियंता 50 लाख और अधीक्षण अभियंता केवल 2 करोड़ रुपये तक के ही काम स्वीकृत कर सकेंगे।
  • जनसंख्या का नया फॉर्मूला: नगर निगमों और पालिकाओं में कमिश्नर, मेयर-इन-काउंसिल (MIC) और प्रेसिडेंट-इन-काउंसिल (PIC) के वित्तीय अधिकार उनकी आबादी के हिसाब से तय कर दिए गए हैं। अगर कोई काम इस तय सीमा से एक रुपया भी बाहर गया, तो सीधे मंत्रालय (राज्य शासन) से अनुमति लेनी होगी।

​3. ‘चहेते ठेकेदारों’ का पत्ता साफ: कार्यालयों में टेंडर फॉर्म देने पर पूर्ण प्रतिबंध

​अधिकारी अपने पसंदीदा ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए दफ्तर बुलाकर टेंडर फॉर्म थमा देते थे और बाकी ठेकेदारों को प्रक्रिया से बाहर कर देते थे।

  • कड़क नियम: अब कार्यालय में प्रत्यक्ष (By-Hand) टेंडर फॉर्म देने की प्रक्रिया को पूरी तरह से प्रतिबंधित (बंद) कर दिया गया है। टेंडर फॉर्म सिर्फ रजिस्टर्ड पोस्ट या स्पीड पोस्ट से ही लिए-दिए जाएंगे। ₹10 लाख से अधिक के सभी काम अनिवार्य रूप से ई-निविदा (Online E-Procurement) से पारदर्शी तरीके से होंगे।

​4. टेंडर ‘चुराने’ की चालाकी बंद, नेशनल मीडिया में देना होगा विज्ञापन

​छोटे अखबारों के कोने में छोटा सा टेंडर निकालकर चहेतों को ठेका देने के खेल को सरकार ने जड़ से उखाड़ फेंका है।

  • नया नियम: ₹20 लाख से ₹1 करोड़ तक के काम के लिए दो बड़े राज्य स्तरीय दैनिक अखबारों में और ₹1 करोड़ से अधिक के कामों के लिए अनिवार्य रूप से एक राज्य स्तरीय तथा एक राष्ट्रीय दैनिक (National Newspaper) अखबार में टेंडर का बड़ा विज्ञापन छपवाना होगा, ताकि देशभर की बड़ी एजेंसियां इसमें भाग ले सकें।

​5. वीआईपी कल्चर पर चोट: भूमि पूजन के ठीक 3 दिन के भीतर शुरू करना होगा काम!

​अक्सर नेता और ठेकेदार चुनाव या वाहवाही लूटने के लिए भूमि पूजन कर देते थे और काम महीनों शुरू नहीं होता था।

  • नया नियम: जिस दिन अनुबंध (Agreement) होगा, उसी दिन कार्यादेश (Work Order) जारी होगा। भूमि पूजन के लिए मान-मनौव्वल तो होगी, लेकिन भूमि पूजन के ठीक 3 दिनों के भीतर हर हाल में काम ऑन-ग्राउंड (जमीन पर) लाइव दिखना चाहिए

​6. एमबी बुक की ओवरराइटिंग और रॉयल्टी चोरी पर ‘ढाई गुना’ महा-जुर्माना

  • मेजरमेंट बुक (MB) की पवित्रता: निर्माण कार्यों का नाप लिखने वाली MB बुक में कोई भी इंजीनियर ओवरराइटिंग, कटिंग, खुरचना या फ्लूइड नहीं लगा सकेगा। ऐसा करना गंभीर अपराध माना जाएगा। कुल राशि का केवल 85% ही चलित बिलों (Running Bills) से भुगतान होगा।
  • खनिज चोरी का कड़ा इलाज: ठेकेदारों को गिट्टी, मुरुम, रेत की ‘रॉयल्टी पर्ची’ देनी होगी। यदि रॉयल्टी चोरी पकड़ी गई, तो मूल रॉयल्टी (₹100) के बदले डीएमएफ, पर्यावरण टैक्स और पेनल्टी मिलाकर सीधे ₹252.50 की दर से (ढाई गुना से अधिक) फाइनल बिल से तगड़ी कटौती की जाएगी।

​7. हर महीने के अंतिम मंगलवार को खुद ‘सचिव’ लेंगी क्लास

​यह आदेश सिर्फ धूल फांकने के लिए नहीं है। विभाग की सचिव खुद प्रत्येक माह के अंतिम मंगलवार को राज्य भर की निविदाओं और विकास कार्यों की लाइव समीक्षा (Review) करेंगी। किसी भी जिले या निकाय में थोड़ी सी भी लापरवाही या विसंगति मिली, तो संबंधित कमिश्नर, सीएमओ और इंजीनियर का सीधा सस्पेंशन तय है।

​📌 विशेष संपादकीय टिप्पणी (Special Editorial Note)

​”कागजी विकास और कमीशनखोरी के खिलाफ सरकार का यह ‘ब्रह्मास्त्र’ है, लेकिन असली परीक्षा क्रियान्वयन की होगी”

​छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों का इतिहास गवाह है कि यहाँ नियम तो बहुत बनते हैं, लेकिन ठेकेदारों का रसूख और भ्रष्ट अफसरों की तिजोरी उन नियमों में सेंध लगा ही लेती है। विभाग की सचिव आर. शंगीता द्वारा जारी यह आदेश प्रशासनिक दृष्टिकोण से बेहद साहसिक, कड़क और त्रुटिहीन (Flawless) है। पहली बार सरकार ने एस्टीमेट बनाने से लेकर, टेंडर निकालने, अखबारों में पारदर्शिता बरतने और सबसे महत्वपूर्ण—भूमि पूजन के 3 दिन के भीतर काम शुरू करने जैसे व्यावहारिक पहलुओं पर सीधे प्रहार किया है।

​अक्सर देखा जाता है कि सड़कें खोद दी जाती हैं और जनता धूल फांकती रहती है क्योंकि ठेकेदार और इंजीनियर कमीशन के खेल में व्यस्त होते हैं। रॉयल्टी चोरी पर ढाई गुना जुर्माना और टेंडर फॉर्मों को ‘बाय हैंड’ देने पर रोक लगाना एक गेम-चेंजर साबित होगा।

लेकिन एक बड़ा सवाल अब भी खड़ा है: क्या यह कड़ा हंटर वाकई जमीन पर असर दिखाएगा? क्योंकि इस आदेश के लागू होने के बाद निकायों की ‘मलाईदार’ अफसरशाही और राजनीतिक रसूखदार ठेकेदारों के पेट में दर्द होना तय है। वे इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए नए रास्ते तलाशने की कोशिश जरूर करेंगे। सरकार की यह पहल तभी ‘शानदार और असरदार’ कहलाएगी, जब हर महीने के अंतिम मंगलवार को होने वाली समीक्षा में वाकई बड़े मगरमच्छों (भ्रष्ट अफसरों और रसूखदार ठेकेदारों) पर गाज गिरती हुई जनता को दिखाई देगी। फिलहाल, इस कड़े कदम के लिए छत्तीसगढ़ सरकार और नगरीय प्रशासन विभाग पूरे नंबरों का हकदार है। जनता को अब राहत की उम्मीद है!

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