छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक शंखनाद: विधानसभा से ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस विधेयक-2026’ पारित

छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक शंखनाद: विधानसभा से ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस विधेयक-2026’ पारित

(AI फोटो)

🔴 जोखिम आधारित बिजनेस परमिशन व्यवस्था लागू करने वाला देश का पहला राज्य बनेगा छत्तीसगढ़

🔴 ‘इंस्पेक्टर राज’ और लालफीताशाही पर आखिरी प्रहार; उद्योगों को हर साल लाइसेंस रिन्यू कराने के झंझट से मिली स्थायी मुक्ति

🔴 छोटे कारोबारियों के लिए ‘सेल्फ सर्टिफिकेशन’ और ‘ऑटो अप्रूवल’ का क्रांतिकारी युग शुरू, 15 लाख से अधिक MSME इकाइयों को सीधा संबल

रायपुर, 17 जुलाई (विशेष संवाददाता)।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ ने देश के औद्योगिक और व्यापारिक परिदृश्य पर एक ऐसा ऐतिहासिक और युगांतकारी कदम उठाया है, जो आने वाले दशकों में राज्य की अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा बदल देगा। छत्तीसगढ़ विधानसभा ने आज ‘छत्तीसगढ़ ईज ऑफ डूइंग बिजनेस विधेयक, 2026’ को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इस कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके लागू होते ही छत्तीसगढ़ पूरे देश का पहला ऐसा राज्य बन जाएगा, जहां उद्योगों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए पूर्णतः ‘जोखिम आधारित’ (Risk-Based) एवं ‘विश्वास आधारित’ (Trust-Based) बिजनेस परमिशन सिस्टम को कानूनी मान्यता दी गई है।
इस विधेयक का मूल उद्देश्य प्रदेश में निवेश की राह में रोड़ा बनने वाली लालफीताशाही (Red-Tapism), जटिल कागजी प्रक्रियाओं और अनावश्यक अनुपालनों के जाल को पूरी तरह से समाप्त करना है। साय सरकार का यह कदम विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के लिए एक पारदर्शी, सुरक्षित, तीव्र और उद्यम-अनुकूल व्यावसायिक वातावरण (Pro-Business Ecosystem) तैयार करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

📋 नए कानून का पूरा एक्स-रे: कैसे बदलेगी छत्तीसगढ़ में व्यापार की सूरत?

1. वर्गीकरण का नया सिद्धांत: ‘जैसा जोखिम, वैसी अनुमति’

अब तक राज्य में छोटे से लेकर बड़े उद्योगों को एक ही जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। लेकिन नए कानून के तहत उद्योगों को उनके आकार, पूंजी और पर्यावरण-सुरक्षा संबंधी गतिविधियों की प्रकृति के आधार पर विभिन्न जोखिम श्रेणियों (Risk Categories) में वर्गीकृत किया जाएगा:

  • कम जोखिम वाले उद्योग (Low-Risk Businesses): छोटे दुकानदारों, एमएसएमई और कुटीर उद्योगों को इसके तहत रखा गया है। इन्हें किसी भी बड़े तकनीकी परीक्षण के बिना, न्यूनतम कागजी कार्रवाई पर तत्काल मंजूरियां मिलेंगी।
  • उच्च जोखिम वाले उद्योग (High-Risk Projects): ऐसे बड़े उद्योग जहां पर्यावरण, जन-सुरक्षा या तकनीकी संवेदनशीलता जुड़ी है, उनके लिए कड़े तकनीकी परीक्षण और समयबद्ध भौतिक निरीक्षण की व्यवस्था पहले की तरह ही मजबूत और प्रभावी रहेगी।

2. ‘इंस्पेक्टर राज’ पर पूर्ण विराम: स्व-घोषणा (Self-Certification) ही सबसे बड़ा प्रमाण

लघु और मध्यम उद्यमियों को सरकारी विभागों के बार-बार होने वाले औचक निरीक्षणों और मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाने के लिए ‘ट्रस्ट-बेस्ड’ व्यवस्था लागू की गई है:

  • कम जोखिम वाले उद्यमों में विभागीय अधिकारियों के चक्कर काटने के बजाय उद्यमी ‘सेल्फ सर्टिफिकेशन’ (स्व-घोषणा) के जरिए अपना काम शुरू कर सकेंगे।
  • इसके अलावा सरकार ने प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत करते हुए लाइसेंसधारी इंजीनियरों, आर्किटेक्ट्स या अन्य अधिकृत पेशेवरों (Authorized Professionals) द्वारा जारी प्रमाण-पत्रों को भी पूरी मान्यता दे दी है।

3. ‘एनुअल रिन्यूअल’ का झंझट खत्म: समय और पैसे की भारी बचत

व्यापारियों की बरसों पुरानी मांग को पूरा करते हुए सरकार ने हर साल लाइसेंस या अनुमतियों के नवीनीकरण (Annual Renewal) की अनिवार्यता को जड़ से समाप्त कर दिया है। अब एक बार मिली अनुमति जोखिम आधारित प्रणाली के नियमों के तहत लंबे समय तक वैध रहेगी। इससे उद्यमियों का वह समय और पैसा बचेगा जो हर साल विभागों के चक्कर काटने में बर्बाद होता था।

4. स्व-घोषणा पर पानी-बिजली और ‘ऑटो अप्रूवल’ (स्वतः स्वीकृति) का सुरक्षा कवच

एमएसएमई इकाइयों को सशक्त बनाने के लिए कानून में कुछ बेहद कड़े और अभूतपूर्व प्रावधान किए गए हैं:

  • जल प्रदाय (Water Supply): इसके लिए किसी लंबी जांच की जरूरत नहीं होगी, केवल उद्यमी की स्व-घोषणा के आधार पर पानी का कनेक्शन और अनुमति मिल जाएगी।
  • भवन अनुज्ञा (Building Permission): अधिकृत विशेषज्ञों के सर्टिफिकेट या सेल्फ सर्टिफिकेशन पर तुरंत बिल्डिंग परमिशन जारी होगी।
  • समयबद्धता और ऑटो अप्रूवल: यदि कोई संबंधित विभाग किसी आवेदन पर निर्धारित समय-सीमा के भीतर निर्णय (स्वीकृति या अस्वीकृति) नहीं लेता है, तो पात्र मामलों में वह अनुमति ‘स्वतः स्वीकृत’ (Auto-Approved) मान ली जाएगी। इसके लिए सॉफ्टवेयर में ऑटो-ट्रिगर की व्यवस्था होगी।

📊 8 विभाग, 43 सेवाएं और त्रिस्तरीय सुरक्षा चक्र

इस कानून को धरातल पर पारदर्शी ढंग से उतारने के लिए पहले चरण में राज्य शासन के 8 सबसे महत्वपूर्ण विभागों की 43 प्रमुख सेवाओं को इस ‘जोखिम आधारित अनुमति प्रणाली’ के दायरे में शामिल किया गया है। भविष्य में उद्योगों की जरूरत को देखते हुए ‘कार्यपालिका परिषद’ की मंजूरी से इसमें और भी विभागों तथा सेवाओं को जोड़ा जा सकेगा।
क्रियान्वयन को पारदर्शी बनाएगी यह ‘त्रिस्तरीय निगरानी व्यवस्था’:

  1. शीर्ष परिषद (Apex Council): साक्षात् मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में यह परिषद नीतिगत दिशा-निर्देश तय करेगी।
  2. राज्य स्तरीय समिति (State Committee): मुख्य सचिव (Chief Secretary) की अध्यक्षता में यह समिति कानून के क्रियान्वयन की दैनिक और मासिक समीक्षा करेगी।
  3. जिला स्तरीय समिति (District Committee): जिला कलेक्टरों की अगुवाई में यह समिति जिला स्तर पर आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों को दूर करेगी और उद्यमियों की समस्याओं का ऑन-स्पॉट निपटारा करेगी।

💡 छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा इसका असर?

  • 15 लाख MSME को संजीवनी: इस ऐतिहासिक सुधार का सबसे बड़ा लाभ छत्तीसगढ़ के 15 लाख से अधिक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को मिलेगा, जो राज्य में रोजगार का सबसे बड़ा जरिया हैं।
  • लागत और समय में कटौती: व्यापार शुरू करने (Time to Market) में लगने वाला समय घटकर आधा रह जाएगा, जिससे नए स्टार्टअप्स और युवा उद्यमियों को प्रोत्साहन मिलेगा।
  • वैश्विक निवेश का खुलेगा द्वार: देश का पहला ‘जोखिम आधारित परमिशन’ राज्य बनने से छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों (National & Global Investors) के लिए सबसे पसंदीदा और सुरक्षित ‘इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन’ बनकर उभरेगा।

💬 मुख्यमंत्री का संदेश: “भरोसा ही हमारे सुशासन का आधार”

विधानसभा में विधेयक पारित होने के बाद मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा कि यह कानून छत्तीसगढ़ के विकास में एक नए युग की शुरुआत है। उन्होंने कहा, “हम अपनी जनता और उद्यमियों पर भरोसा करते हैं। हमारी सरकार का मानना है कि भरोसे, स्व-घोषणा और समयबद्ध डिजिटल सेवाओं के जरिए ही ‘विकसित छत्तीसगढ़’ का सपना पूरा हो सकता है। हमने उद्योगों को प्रक्रियात्मक जटिलताओं से आजाद किया है, ताकि वे बिना किसी डर या बाधा के देश की तरक्की में अपना योगदान दे सकें।”

विशेष संपादकीय टिप्पणी:
‘छत्तीसगढ़ ईज ऑफ डूイング बिजनेस विधेयक-2026’ महज एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति का एक जीवंत दस्तावेज है। जहां एक ओर यह कानून छोटे व्यापारियों को ‘इंस्पेक्टर राज’ के भय से मुक्त करता है, वहीं दूसरी ओर उच्च जोखिम वाले उद्योगों पर कड़ी निगरानी रखकर पर्यावरण और जन-सुरक्षा से कोई समझौता न करने की प्रतिबद्धता भी जताता है। यह संतुलन ही इस विधेयक को देश का सबसे आधुनिक और प्रगतिशील कानून बनाता है।

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