जनभागीदारी से सँवरती हरियाली: सीड बॉल अभियान से साकार हो रहा ‘हरित छत्तीसगढ़’ का संकल्प
– धनंजय राठौर(संयुक्त संचालक) – अशोक कुमार चंद्रवंशी(सहायक जनसंपर्क अधिकारी) प्रकृति और मानव का रिश्ता अनादि काल से अटूट रहा है, लेकिन बढ़ते शहरीकरण और घटते वनों ने आज संपूर्ण विश्व के समक्ष जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। इस चुनौती से निपटने और धरती का श्रृंगार पुनः लौटाने के लिए छत्तीसगढ़ में एक मूक क्रांति जन्म ले चुकी है—‘सीड बॉल अभियान’। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के सशक्त नेतृत्व और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में राज्य का वन विभाग न केवल पारंपरिक पौधारोपण कर रहा है, बल्कि ‘सीड बॉल’ (बीज गोलों) के माध्यम से दूरस्थ, दुर्गम और पहाड़ी क्षेत्रों को पुनः हरा-भरा करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल कर चुका है। ‘एक पेड़ माँ के नाम’, ‘वन महोत्सव’ और ‘युवा फॉर नेचर’ जैसे अभियानों की श्रृंखला में ‘सीड बॉल’ एक अत्यंत सरल, किफायती और चमत्कारिक माध्यम बनकर उभरा है।
क्या है ‘सीड बॉल’ और कैसे करता है कमाल?
सीड बॉल वस्तुतः बीज, चिकनी मिट्टी और जैविक खाद (गोबर या वर्मीकंपोस्ट) के सम्मिश्रण से तैयार किया गया एक छोटा प्राकृतिक आवरण होता है। बीजों को मिट्टी और खाद की सुरक्षात्मक परत में लपेटकर सुखा लिया जाता है।
प्रयोग का आसान तरीका: इसके लिए किसी भारी कुदाल, गड्ढा खोदने या निरंतर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। मानसून की पहली फुहारों के साथ जब माटी में नमी घुलती है, तब यात्रा करते समय, दुर्गम पहाड़ियों पर या खाली पड़े मैदानों में इन्हें बस फेंक दिया जाता है। बारिश का पानी मिलते ही मिट्टी का गोला घुलता है, खाद से पोषण प्राप्त होता है और बीज एक नन्हे जीवन के रूप में अंकुरित होकर पौधे का रूप ले लेता है।
जन-आंदोलन बनी प्राकृतिक संजीवनी
छत्तीसगढ़ का यह अभियान केवल शासकीय योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘जन-जन का अभियान’ बन चुका है। राज्य के विभिन्न जिलों में:
स्कूली बच्चे और युवा: खेल-खेल में पर्यावरण संरक्षण की सीख ले रहे हैं।
महिला स्व-सहायता समूह (SHGs): आजीविका के साथ-साथ सीड बॉल का निर्माण कर हरित क्रांति की धुरी बन रही हैं।
स्थानीय ग्रामीण व स्वयंसेवी संस्थाएं: दुर्गम जंगलों में जाकर लाखों बीजों का रोपण सुनिश्चित कर रही हैं। जब समाज का हर वर्ग—बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग—मिट्टी से बीज गोलियाँ बनाकर प्रकृति को सौंपते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण का संकल्प खुद-ब-खुद मजबूत हो जाता है।
जैव विविधता का संरक्षण और स्थानीय प्रजातियों पर जोर
छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक संपदा उसकी जैव विविधता में बसती है। इस अभियान के तहत मुख्य रूप से राज्य की जलवायु के अनुकूल व उपयोगी स्थानीय प्रजातियों के बीजों का चयन किया गया है: | उपयोग में लाए जा रहे प्रमुख बीज | |—| | फलदार व औषधीय: महुआ, इमली, हर्रा, बहेड़ा, जामुन, आम, करंज, नीम, चार | | इमारती व विशाल वृक्ष: शाल, बीजा, खमार, बरगद, पीपल | इन प्रजातियों के विस्तार से न केवल जंगलों का प्राकृतिक घनत्व बढ़ेगा, बल्कि वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास में ही भोजन और आश्रय मिल सकेगा, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष में भी कमी आएगी।
कम लागत में पर्यावरण सुरक्षा का अचूक अस्त्र
सीड बॉल अभियान का आर्थिक और पर्यावरण की दृष्टि से बहुत गहरा प्रभाव है:
भू-क्षरण पर रोक: पौधों की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं, जिससे कटाव रुकता है।
जल संरक्षण: हरित आवरण बढ़ने से भू-जल स्तर में सुधार होता है।
कार्बन अवशोषण: नए वृक्ष कार्बन उत्सर्जन को सोखकर वैश्विक तापक्रम (ग्लोबल वॉर्मिंग) को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं।
न्यूनतम लागत, अधिकतम परिणाम: यह कम से कम संसाधनों में विशाल भू-भाग को वनाच्छादित करने का सबसे प्रभावी तरीका है।
हरित भविष्य के लिए एक नागरिक कर्तव्य
प्रकृति हमें जीवनदायिनी वायु, जल और अन्न देती है, जिसके प्रति हमारी भी कुछ नैतिक ज़िम्मेदारियाँ हैं। यदि राज्य का प्रत्येक नागरिक इस वर्षा ऋतु में स्वयं अपनी हाथों से कुछ सीड बॉल तैयार करे और खाली पड़े स्थानों या अपनी यात्राओं के दौरान उन्हें प्रकृति की गोद में सौंप दे, तो आने वाले कुछ ही वर्षों में छत्तीसगढ़ की धरती और अधिक समृद्ध, शस्य-श्यामला और जीवंत हो उठेगी। सीड बॉल केवल मिट्टी का एक गोला नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और सस्टेनेबल (सतत) भविष्य का बीज है। आइए, इस मानसून में हम सब मिलकर ‘हरित छत्तीसगढ़’ के इस पावन संकल्प के सहभागी बनें!