बीजापुर, 05 मई 2026
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की बयार अब धरातल पर दिखने लगी है। बीजापुर जिले के जनपद पंचायत बीजापुर के अंतर्गत आने वाला ग्राम पंचायत संतोषपुर, जो कभी नक्सली साये के कारण विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ था, आज ‘बदलाव का मॉडल’ बनकर उभर रहा है। शासन की महत्वाकांक्षी ‘नियद नेल्लनार योजना’ (आपका अच्छा गांव) ने यहाँ के युवाओं के हाथों में बंदूक की जगह हुनर थमा दिया है, जिसका जीता-जागता उदाहरण ग्रामीण रमेश पासपुल हैं।

आर्थिक तंगी से कुशलता तक का सफर
संतोषपुर निवासी श्री रमेश पासपुल के लिए जीवन हमेशा से संघर्षपूर्ण रहा। स्थायी रोजगार न होने के कारण वे लंबे समय तक आर्थिक तंगी से जूझते रहे। परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ और आय का कोई निश्चित साधन न होना उनके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा रहा था। लेकिन जब गांव में ‘नियद नेल्लनार योजना’ का विस्तार हुआ, तो रमेश के जीवन में उम्मीद की नई किरण जागी।

योजना के तहत रमेश ने राजमिस्त्री (मेसन) का तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस दौरान उन्होंने निर्माण कार्य की बारीकियों और आधुनिक कौशल को सीखा, जो उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
खुद बनाया अपना आशियाना, फिर दूसरों के लिए बने मिसाल
रमेश के कौशल की पहली परीक्षा तब हुई जब वित्तीय वर्ष 2024-25 में उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत स्वयं के पक्के मकान की स्वीकृति मिली। पहली किश्त मिलते ही रमेश ने किसी बाहरी मिस्त्री पर निर्भर रहने के बजाय खुद अपने घर की नींव रखी। उन्होंने न केवल निर्धारित समय में गुणवत्तापूर्ण निर्माण किया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि हुनरमंद होने के क्या फायदे हैं।
गांव में बढ़ी मांग, मिला सम्मान और रोजगार
रमेश द्वारा बनाए गए मकान की फिनिशिंग और मजबूती देखकर गांव के अन्य हितग्राही भी प्रभावित हुए। आज स्थिति यह है कि संतोषपुर और आसपास के ग्रामीण अपने आवास निर्माण के लिए रमेश को ही पहली प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे रमेश को न केवल गांव में एक कुशल राजमिस्त्री के रूप में नई पहचान मिली, बल्कि उनके लिए आय का एक स्थायी स्रोत भी विकसित हो गया है।
शासन की योजनाओं का सफल क्रियान्वयन
रमेश पासपुल की यह प्रेरक यात्रा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शासन की योजनाओं की सफलता का प्रमाण है। जिला प्रशासन के अनुसार, ‘नियद नेल्लनार योजना’ का उद्देश्य बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ युवाओं को कौशल विकास से जोड़ना है ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
रमेश की सफलता आज संतोषपुर के अन्य युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। यह कहानी दर्शाती है कि यदि सही प्रशिक्षण और अवसर मिले, तो संघर्षपूर्ण परिस्थितियों से निकलकर भी स्वावलंबन का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। संतोषपुर अब केवल एक नक्सल प्रभावित क्षेत्र नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर होते बस्तर की नई पहचान है।
