रार और रफ्तार: छत्तीसगढ़ कांग्रेस के बदलते राजनीतिक समीकरण

रायपुर 24 मई। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के वर्तमान राजनीतिक समीकरण इस समय एक बेहद संवेदनशील और बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद से पार्टी के भीतर संगठनात्मक नेतृत्व और पुरानी गुटबाजी एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है।

. पीसीसी अध्यक्ष पद को लेकर घमासान (Deepak Baij Vs T.S. Singh Deo)

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में इस समय सबसे बड़ा राजनीतिक समीकरण प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के अध्यक्ष पद को लेकर बना हुआ है।

  • सिंहदेव की खुलकर दावेदारी: वरिष्ठ नेता और पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव ने हाल ही में सार्वजनिक रूप से खुद को पीसीसी चीफ की जिम्मेदारी के लिए तैयार बताकर संगठन में हलचल तेज कर दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरगुजा संभाग में पिछले चुनाव में मिली करारी हार के बाद सिंहदेव संगठन की कमान हाथ में लेकर अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत करना चाहते हैं।
  • दीपक बैज का रुख: वर्तमान पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज का कार्यकाल अभी चल रहा है। सिंहदेव के बयानों के बाद बैज समर्थकों की तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं, जिसमें सिंहदेव को दिल्ली (केंद्रीय राजनीति) में जाकर काम करने की सलाह तक दी गई है। इससे संगठन के भीतर ‘बदलाव बनाम यथास्थिति’ की जंग साफ दिख रही है।
  • अन्य दावेदार: रेस में केवल सिंहदेव ही नहीं हैं, बल्कि युवाओं और ओबीसी चेहरे के तौर पर उमेश पटेल जैसे कद्दावर नेताओं के नामों की चर्चा भी दिल्ली दरबार में जोरों पर है।

. भूपेश बघेल की ‘रणनीतिक तटस्थता’ और राष्ट्रीय भूमिका

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का यह कहना कि वे “सिंहदेव के बयानों पर प्रतिक्रिया नहीं देते”, उनके एक बड़े रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है।

  • विवादों से दूरी: पांच साल तक सत्ता के केंद्र में रहने के बाद बघेल अब खुद को प्रादेशिक गुटबाजी और बयानों की खींचतान से दूर रख रहे हैं।
  • हाईकमान पर छोड़ा फैसला: उन्होंने पूरा दारोमदार आलाकमान (AICC) पर डाल दिया है, जिससे यह संदेश जाए कि वे पार्टी के अनुशासित सिपाही हैं।
  • राष्ट्रीय जिम्मेदारियां: हाईकमान द्वारा बघेल को समय-समय पर राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारियां (जैसे पूर्व में राष्ट्रीय गठबंधन समिति और अन्य राज्यों के प्रभार) सौंपे जाने के कारण राज्य की राजनीति में उनकी भूमिका अब एक ‘मेंटर’ और वरिष्ठ मार्गदर्शक की बनती जा रही है। हाल ही में उन्होंने खुद छत्तीसगढ़ से राज्यसभा जाने के बजाय अन्य स्थानीय चेहरों को मौका देने की बात कहकर अपनी परिपक्व राजनीति का परिचय दिया है।

क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों का संतुलन

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती छत्तीसगढ़ के पारंपरिक वोट बैंक (ओबीसी, आदिवासी और अनुसूचित जाति) को साधे रखने की है।

  • आदिवासी नेतृत्व: वर्तमान अध्यक्ष दीपक बैज बस्तर (आदिवासी बेल्ट) से आते हैं। यदि हाईकमान सिंहदेव (जो कि राजपरिवार और सामान्य वर्ग से हैं) को कमान सौंपता है, तो पार्टी को बस्तर और सरगुजा के आदिवासी मतदाताओं के बीच संतुलन बिठाने के लिए कार्यकारी अध्यक्षों या अन्य प्रमुख पदों पर आदिवासी और ओबीसी चेहरों को बड़ी तवज्जो देनी होगी।
  • आगामी स्थानीय चुनाव: आगामी चुनावों से पहले संगठन का बिखराव पार्टी पर भारी पड़ सकता है, इसीलिए हाईकमान ऐसा चेहरा तलाश रहा है जो सभी गुटों को एक साथ लेकर चल सके।

विपक्ष की आक्रामकता और कांग्रेस की घेराबंदी

संगठन की इस अंदरूनी कलह का सीधा फायदा सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) को मिल रहा है।

  • कांग्रेस वर्तमान में राज्य की साय सरकार को कानून-व्यवस्था, बढ़ते अपराध और जनहित के मुद्दों पर लगातार घेरने की कोशिश कर रही है। टी.एस. सिंहदेव खुद सरकार की कमियों पर मुखर होकर बयान दे रहे हैं।
  • लेकिन जैसे ही कांग्रेस के भीतर अध्यक्ष पद को लेकर खींचतान शुरू होती है, भाजपा इसे “कांग्रेस की अंतहीन गुटबाजी” करार देकर मुख्य मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने में कामयाब हो जाती है।

गेंद अब दिल्ली दरबार में

छत्तीसगढ़ कांग्रेस का वर्तमान राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से ‘वेट एंड वॉच’ (Wait and Watch) की स्थिति में है। भूपेश बघेल की चुप्पी, सिंहदेव की सक्रियता और दीपक बैज का अपना पद बचाने का संघर्ष—इन तीनों कोणों के बीच अब अंतिम फैसला कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी को करना है। आलाकमान का आगामी फैसला ही यह तय करेगा कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस एकजुट होकर वापसी करेगी या अंदरूनी अंतर्द्वंद्व में ही उलझी रहेगी।

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