विशेष संवाददाता, जगदलपुर 20 जून । डिजिटल गवर्नेंस और ग्रासरूट ब्यूरोक्रेसी का ‘बस्तर मॉडल’: सुशासन की एक नई मिसाल
जब फाइलें नहीं, बल्कि जनता के द्वार खुद चलकर पहुंचा प्रशासन
तकनीक और जन-समन्वय से बदला राजस्व सेवाओं का चेहरा, एक पुरानी समस्या का नया समाधान
छत्तीसगढ़ का आदिवासी बहुल जिला बस्तर आज देश में सुशासन की एक नई मिसाल बनकर उभरा है। कभी अपनी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और अंदरूनी समस्याओं के लिए जाने जाने वाले इस इलाके ने तकनीक और जन-समन्वय के अनूठे मेल से राजस्व सेवाओं का चेहरा पूरी तरह बदल दिया है। ‘बस्तर मॉडल’ के तहत अब आम जनता को सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ रहे हैं, बल्कि प्रशासन खुद चलकर जनता के द्वार तक पहुंच रहा है।

हाल ही में बस्तर संभाग के समग्र विकास के लिए शुरू किए गए विशेष अभियान ‘बस्तर मुन्ने’ (अग्रणी बस्तर) और ‘नियद नेल्ला नार’ के तहत इस प्रशासनिक बदलाव को एक नई ताकत मिली है। यह मॉडल आज केवल बस्तर ही नहीं, बल्कि पूरे देश के प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
‘सक्रिय अभियान’: एक क्रांतिकारी प्रशासनिक सोच
राजस्व से जुड़े मामलों, जैसे जमीन का नामांतरण, बंटवारा, फौती (उत्तराधिकार) और रिकॉर्ड सुधार के लिए ग्रामीणों को सालों इंतजार करना पड़ता था। इस पुरानी समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए बस्तर प्रशासन ने ‘सक्रिय अभियान’ की शुरुआत की। यह कोई आम सरकारी कार्यक्रम नहीं है, बल्कि एक ऐसी क्रांतिकारी सोच है जहां सरकारी अमला दफ्तरों में बैठकर आवेदनों का इंतजार नहीं करता, बल्कि खुद आगे रहकर समस्याओं को ढूंढता है और उनका तुरंत हल निकालता है।

इस अभियान के तहत घने जंगलों और दूरदराज के गांवों में विशेष ‘संतृप्ति शिविर’ (सैचुरेशन कैम्प) लगाए जा रहे हैं। इंटरनेट कनेक्टिविटी न होने पर भी विशेष उपकरणों और ऑफलाइन डिजिटल टूल्स की मदद से मौकों पर ही फाइलों का निपटारा किया जा रहा है। इससे ग्रामीणों के समय, बस भाड़े और दलालों के चक्कर में बर्बाद होने वाले पैसों की बड़ी बचत हो रही है।
प्रशासनिक तंत्र की रीढ़: जब ‘त्रिमूर्ति’ ने संभाला मोर्चा
इस पूरे मॉडल की जमीनी सफलता के पीछे ग्रासरूट ब्यूरोक्रेसी (जमीनी नौकरशाही) की एक ‘त्रिमूर्ति’ काम कर रही है। जब इन तीनों कड़ियों ने एक टीम के रूप में मोर्चा संभाला, तो सालों से लटके मामले चंद दिनों में सुलझने लगे:
- पटवारी (डिजिटल सारथी): ये सीधे गांवों में पहुंचकर जमीन के रिकॉर्ड को अपने टैबलेट और लैपटॉप के जरिए सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म (भुइयां पोर्टल) पर तुरंत अपडेट करते हैं।
- राजस्व निरीक्षक / आरआई (जमीनी पड़ताल): ये विवादित जमीनों पर खुद जाकर नक्शा और सीमांकन (नापजोख) का काम ग्रामीणों के सामने तेजी से पूरा करते हैं।
- तहसीलदार (त्वरित न्याय): ये शिविरों में ही ऑन-द-स्पॉट या डिजिटल माध्यम से मामलों की सुनवाई कर बिना किसी देरी के अंतिम आदेश जारी करते हैं।
इस त्रिमूर्ति के आपसी तालमेल ने प्रशासनिक तंत्र की रीढ़ को मजबूत कर दिया है और लालफीताशाही (फाइलों के अटकने की आदत) को पूरी तरह खत्म कर दिया है।
डिजिटल तकनीक और जन-विश्वास का कमाल
बस्तर मॉडल की सबसे बड़ी ताकत डिजिटल गवर्नेंस और स्थानीय आदिवासियों का भरोसा है। ऑनलाइन पोर्टलों, सैटेलाइट मैपिंग और डिजिटल हस्ताक्षरों की मदद से पूरी प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया गया है। अब कोई भी ग्रामीण अपने नजदीकी ‘प्रज्ञा केंद्र’ या मोबाइल से अपनी जमीन का स्टेटस देख सकता है।
इसके साथ ही, प्रशासन स्थानीय गोंडी और हल्बी भाषाओं में ग्रामीणों से संवाद कर रहा है। इससे जनता के मन से सरकारी तंत्र और साहब लोगों का डर पूरी तरह दूर हो गया है। प्रशासन की इस सक्रियता से अब तक हजारों लंबित राजस्व मामलों का निपटारा किया जा चुका है।
विकास का ‘बस्तर 2.0’ विजन
यह बदलाव केवल कागजों तक सीमित नहीं है। राज्य के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में ‘बस्तर 2.0’ और ‘सुघ्घर छत्तीसगढ़’ जैसी योजनाओं के तहत बस्तर संभाग के सभी 7 जिलों (दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा, कोंडागांव, नारायणपुर, बस्तर और कांकेर) के प्रत्येक पात्र व्यक्ति तक शत-प्रतिशत सरकारी लाभ पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
“जहां कभी गोलियों की गूंज रास्ता तय करती थी, आज वहां सुशासन और विकास दिशा दिखा रहा है। बस्तर का यह मॉडल यह साबित करता है कि अगर प्रशासनिक इच्छाशक्ति हो, तो आधुनिक तकनीक के सहारे सबसे कठिन और संवेदनशील क्षेत्रों में भी जनता का दिल जीता जा सकता है।”
