तंगहाली के कांटों को रौंदकर महकी बिलाईगढ़ की ‘राजकुमारी’

विशेष संवाददाता
रायपुर, 27 जून।

तंगहाली के कांटों को रौंदकर महकी बिलाईगढ़ की ‘राजकुमारी’

पलायन की त्रासदी झेलने वाली मजबूर महिला ‘बिहान’ के संबल से बनी ‘लखपति दीदी’
रायपुर, 27 जून। छत्तीसगढ़ की माटी में संघर्ष और स्वावलंबन की एक ऐसी अमिट इबारत लिखी गई है, जो देश की लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा का नया अध्याय बन गई है। यह कहानी है सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के विकासखंड बिलाईगढ़ के ग्राम बिलासपुर की रहने वाली श्रीमती राजकुमारी साहू की। कभी दो वक्त की सूखी रोटी और बच्चों के बेहतर भविष्य की तलाश में अपनी सरजमीं छोड़कर दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर राजकुमारी, आज आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा गढ़ रही हैं। कल तक जो हाथ तंगहाली के आगे बेबस थे, आज वे राज्य सरकार की ‘बिहान’ योजना की बदौलत न सिर्फ अपने परिवार की किस्मत बदल रहे हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई रफ्तार दे रहे हैं।

पलायन का दंश और दो वक्त की रोटी का संघर्ष

कुछ साल पहले तक राजकुमारी साहू का जीवन अभावों और अनिश्चितताओं के बीच कट रहा था। स्थानीय स्तर पर रोजगार की कमी और तंगहाली के कारण उन्हें अपने परिवार के साथ छत्तीसगढ़ से दूर अन्य राज्यों में पलायन करना पड़ा था। ईंट-भट्टों और कड़े श्रम के बीच बच्चों का भविष्य धुंधला नजर आ रहा था। अपनी ही धरती पर बेगाने होकर जीने की यह त्रासदी बेहद कष्टदायक थी, लेकिन राजकुमारी के भीतर कुछ कर गुजरने का जज्बा मरा नहीं था।

‘बिहान’ ने बदला जीवन, स्वयं सहायता समूह बना सहारा

राजकुमारी के जीवन में यू-टर्न तब आया जब वे वापस अपने गांव लौटीं और छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) से जुड़ीं। बिहान योजना के तहत गठित महिला स्वयं सहायता समूह (SHG) ने उन्हें न केवल आर्थिक संबल दिया, बल्कि उनके भीतर छिपे आत्मविश्वास को भी जगाया। समूह से मिलने वाले छोटे-छोटे ऋण और तकनीकी प्रशिक्षण की मदद से उन्होंने स्थानीय स्तर पर ही स्वरोजगार की शुरुआत की।

‘लखपति दीदी’ बनने का सफर

राजकुमारी ने समूह के माध्यम से मिले मार्गदर्शन का पूरा लाभ उठाया। उन्होंने खेती-किसानी के साथ-साथ पशुपालन और अन्य पूरक व्यवसायों को अपनाया। कड़ी मेहनत और बेहतर प्रबंधन के बूते उनकी आय में लगातार इजाफा होता गया। आज वे सालाना एक लाख रुपये से अधिक की शुद्ध कमाई कर रही हैं और गर्व से ‘लखपति दीदी’ के रूप में पहचानी जाती हैं। अब उन्हें रोजगार के लिए किसी दूसरे राज्य का रुख नहीं करना पड़ता, बल्कि वे अपने ही गांव में सम्मानजनक जीवन जी रही हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही रफ्तार

राजकुमारी साहू की यह सफलता सिर्फ एक व्यक्ति की कामयाबी नहीं है। वे आज अपने गांव और आसपास के क्षेत्र की अन्य ग्रामीण महिलाओं के लिए रोल मॉडल बन चुकी हैं। उन्हें देखकर अन्य महिलाएं भी आत्मनिर्भर बनने के लिए आगे आ रही हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं और गांवों से होने वाले पलायन में भारी कमी दर्ज की जा रही है।

“कभी लगता था कि हमारी किस्मत में सिर्फ मजदूरी और पलायन ही लिखा है। लेकिन ‘बिहान’ योजना ने हमें जीना सिखाया। आज मैं अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पा रही हूँ और समाज में सिर उठाकर जी रही हूँ।”
श्रीमती राजकुमारी साहू, लखपति दीदी (ग्राम बिलासपुर, बिलाईगढ़)

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