रायपुर/दुर्ग 5 जुलाई :
छत्तीसगढ़ की माटी की सुवास और लोक कला ‘पंडवानी’ को सात समंदर पार तक गूंज देने वाली अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कलाकार पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का आज (5 जुलाई 2026) सुबह निधन हो गया। उन्होंने रायपुर के एम्स (AIIMS) अस्पताल में तड़के 3:15 बजे अंतिम सांस ली। वे पिछले कुछ समय से उम्र से जुड़ी गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं। उनके निधन की खबर से छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश के कला, संस्कृति और संगीत जगत में एक युग का अंत हो गया है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि
तीजन बाई के अवसान पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने गहरा दुःख व्यक्त करते हुए इसे राज्य और देश के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया है। मुख्यमंत्री ने ट्वीट (X) कर और अपने आधिकारिक संदेश में कहा:
“पंडवानी की पुरोधा, छत्तीसगढ़ महतारी की लाडली बेटी पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई जी के निधन की खबर अत्यंत पीड़ादायक है। उन्होंने अपनी बुलंद आवाज और तंबूरे की थाप से छत्तीसगढ़ की संस्कृति को वैश्विक मंच पर जो गौरव दिलाया, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। महाभारत के पात्रों को मंच पर जीवंत कर देने वाली तीजन बाई जी का जाना लोक कला के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत है। मैं ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति और शोकाकुल परिजनों व उनके लाखों प्रशंसकों को यह वज्रपात सहन करने की शक्ति देने की प्रार्थना करता हूँ। ॐ शांति।”
राजकीय सम्मान के साथ होगी विदाई:
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के निर्देशानुसार, डॉ. तीजन बाई का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान (State Honors) के साथ उनके पैतृक गांव दुर्ग जिले के गनियारी में किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने जिला प्रशासन को अंतिम संस्कार की सभी व्यवस्थाएं गरिमामय ढंग से सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर रचा इतिहास
24 अप्रैल 1956 को दुर्ग के गनियारी में जन्मीं तीजन बाई का जीवन संघर्ष और जीवटता की एक अद्भुत मिसाल है। महज 13 साल की उम्र में जब उन्होंने हाथ में तंबूरा थामा, तब समाज में महिलाओं का ‘कापालिक शैली’ में खड़े होकर पंडवानी गाना वर्जित माना जाता था। अपनों के विरोध, सामाजिक बहिष्कार और भीषण तंगहाली के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।
अपनी कड़क आवाज, चेहरे के अद्भुत भाव-भंगिमा और तंबूरे को कभी गदा तो कभी तीर-धनुष की तरह इस्तेमाल करने की उनकी अनूठी कला ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने देश ही नहीं, बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और जापान जैसे देशों में भी छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति का परचम लहराया।
सम्मानों का शिखर सफर
कला के क्षेत्र में उनके अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया गया:
- पद्मश्री (1988)
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)
- पद्मभूषण (2003)
- पद्म विभूषण (2019)
- बिलासपुर विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. की मानद उपाधि।
शांत हुई तंबूरे की थाप, लेकिन अमर रहेगी आवाज
कुछ समय पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी फोन पर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली थी और उन्हें देश की अनमोल धरोहर कहा था। आज भले ही महाभारत के ‘दुःशासन वध’ और ‘कर्ण पर्व’ को अपनी आवाज से जीवंत करने वाली तीजन बाई हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन लोक संगीत के इतिहास में उनका नाम हमेशा अमर रहेगा। उनके निधन पर राज्य के मंत्रियों, कलाकारों और छत्तीसगढ़ के जन-जन ने अपनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित की है।
