बिचौलियों का सिंडिकेट ध्वस्त, सोसायटियों में नहीं लगी कतारें; 32 एकड़ के किसान हड़मा राम की कहानी बनी बस्तर के बदलते मिजाज का आईना
विशेष खोजी रिपोर्ट | सुकमा/रायपुर, 7 जुलाई 2026
छत्तीसगढ़ का सुकमा जिला… कभी इस नाम के साथ संघर्ष, दुर्गम रास्ते और चुनौतियां ही जेहन में उभरती थीं। लेकिन आज सुकमा की पहचान बदल रही है। आज यहां की पहचान बारूद की गंध नहीं, बल्कि मानसूनी मिट्टी की सोंधी खुशबू और खेतों में लहलहाने को तैयार उम्मीदें हैं। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के ‘समृद्ध किसान, सशक्त प्रदेश’ के विजन को सुकमा जिला प्रशासन ने जिस शिद्दत से जमीन पर उतारा है, उसने वनांचल के अंतिम छोर पर बैठे आदिवासी किसानों के चेहरों पर वो मुस्कान बिखेर दी है, जो बरसों से लापता थी।

वक्त पर खाद, उन्नत बीज और बिना किसी दफ्तर के चक्कर काटे कृषि ऋण की उपलब्धता—ये तीन ऐसे स्तंभ हैं जिन्होंने इस खरीफ सीजन में सुकमा के किसानों की तकदीर का रुख मोड़ दिया है।

जब ‘अन्नदाता’ बना आत्मनिर्भर: हड़मा राम की जादुई कहानी
सुकमा जिले के रानीबहाल गांव के धरती पुत्र हड़मा राम मरकाम की कहानी कोई सामान्य प्रशासनिक सफलता नहीं, बल्कि एक किसान के स्वाभिमान की पुनर्स्थापना है। 32 एकड़ की विशाल जोत पर पारंपरिक खेती करने वाले हड़मा राम के लिए जून-जुलाई का महीना हमेशा ‘आर्थिक तनाव’ लेकर आता था।
लेकिन इस बार कलेक्टर श्री अमित कुमार की मुस्तैदी ने छिंदगढ़ सहकारी समिति के जरिए हड़मा राम की जिंदगी की सबसे बड़ी उलझन चुटकियों में सुलझा दी। उन्हें 3 लाख 50 हजार रुपये का सब्सिडीयुक्त कृषि ऋण बिना किसी ‘टेबल-खर्ची’ या लालफीताशाही के समय पर मिल गया।
“अब साहूकार की चौखट नहीं, अपना खेत प्यारा है”
भावुक और सधे हुए स्वर में हड़मा राम कहते हैं— “एक वक्त था जब मानसून सिर पर होता था और हम खाद-बीज की किल्लत और साहूकारों के ब्याज के चक्रव्यूह में फंसे होते थे। इस बार साय सरकार की नीयत साफ थी, तो प्रशासन ने हमारे खेतों तक खुशहाली का रास्ता साफ कर दिया। पैसा समय पर मिला, तो मैंने बोआई की तैयारी बिना एक दिन गंवाए पूरी कर ली। यह हमारे लिए किसी वरदान से कम नहीं है।”
प्रशासन का ‘सुपर-एक्शन प्लान’: बिचौलियों के सिंडिकेट पर सर्जिकल स्ट्राइक
यह बदलाव रातों-रात नहीं आया। इसके पीछे जिला प्रशासन और पुलिस की वो खामोश व्यूहरचना थी, जिसने सीजन शुरू होने से पहले ही मुनाफाखोरों की कमर तोड़ दी:
- लॉजिस्टिक का मास्टरस्ट्रोक: सुकमा के कई इलाके ऐसे हैं जो भारी बारिश में जिला मुख्यालय से कट जाते हैं। प्रशासन ने ‘प्री-पोजिशनिंग’ नीति के तहत मई के कड़कड़ाती धूप वाले दिनों में ही इन पहुंचविहीन अंचलों के सरकारी गोदामों को खाद और उन्नत बीजों से पाट दिया था।
- दलालों पर नकेल: कलेक्टर के निर्देश पर राजस्व और पुलिस की संयुक्त ‘क्रैकडाउन’ टीमों ने अवैध भंडारण और कृत्रिम किल्लत पैदा करने वाले बिचौलियों के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापे मारे। नतीजा? कालाबाजारी पूरी तरह ठप हो गई और किसानों को निर्धारित सरकारी मूल्य पर सामग्री मिली।
📊 ग्राउंड रिपोर्ट: क्यों खास है इस बार का ‘सुकमा
| मापदंड | पहले की स्थिति | अब (खरीफ 2026) की तस्वीर |
|---|---|---|
| खाद-बीज की उपलब्धता | सोसायटियों में लंबी कतारें, कृत्रिम किल्लत | मानसून से पहले दूरस्थ गांवों तक अग्रिम भंडारण |
| कृषि ऋण प्रक्रिया | हफ्तों तक दफ्तरों के चक्कर, कागजी पेचीदगियां | सिंगल-विंडो तत्परता, सीधे खाते में पारदर्शी ट्रांसफर |
| बाजार की स्थिति | बिचौलियों और ऊंचे दामों का बोलबाला | सख्त प्रशासनिक निगरानी, जीरो टॉलरेंस नीति |
बदले मिजाज का संदेश: भरोसे की नई फसल तैयार है
यह केवल एक सरकारी योजना का क्रियान्वयन नहीं है; यह सुकमा के उस आदिवासी समाज का व्यवस्था पर लौटता हुआ ‘अटूट विश्वास’ है, जो मुख्यधारा से कटा हुआ महसूस करता था। जब किसान की जेब में सही समय पर पैसा और हाथ में बेहतरीन बीज होता है, तो वह सिर्फ फसल नहीं उगाता, वह अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करता है।
हड़मा राम मरकाम के खेतों में हो रही हलचल इस बात का साफ संकेत है कि इस बार सुकमा के बियावानों से धान की बालियां नहीं, बल्कि समृद्धि की नई गूंज सुनाई देगी। सरकार की नीयत साफ हो और प्रशासन में इच्छाशक्ति, तो सुकमा जैसी दुर्गम जमीन पर भी तरक्की का नया सूरज उगाया जा सकता है।
