* असाढ़ की तपिश के बाद सावन की झमाझम: छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में धान रोपाई ने पकड़ी रफ्तार
* ब्यूरोक्रेसी की मुस्तैदी और कुदरत का वरदान: सहकारी समितियों से सीधे खेतों तक बिना बाधा पहुंच रहा खाद-बीज
विशेष खोजी रिपोर्ट
रायपुर/कोरबा, 07 जुलाई 2026
छत्तीसगढ़ की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए जून और जुलाई के शुरुआती दिन किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। आसमान में बादलों की लुकाछिपी और बेरुखी ने प्रदेश के लाखों अन्नदाताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी थीं। सूखी और तपती धरती को देखकर धान के कटोरे में बुआई और रोपाई को लेकर संशय के बादल मंडराने लगे थे। हर सुबह उम्मीद और शाम को निराशा के बीच झूलते किसानों की यह तपस्या आखिरकार रंग लाई। पिछले कुछ दिनों से प्रदेश भर में हो रही झमाझम मानसूनी बारिश ने न केवल मौसम का मिजाज बदला है, बल्कि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण परिदृश्य की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख दी है।

तपती धूप से झुलसी माटी पर जैसे ही अमृत रूपी बूंदें गिरीं, केवल सोंधी महक ही नहीं बिखरी, बल्कि किसानों के दिलों में नई उम्मीद, अटूट विश्वास और समृद्धि के अंकुर फूट पड़े।
महाकवि की कल्पना जैसा ग्रामीण वैभव: सजीव हुई गांवों की तस्वीर
दूर-दूर तक फैले खेतों में अब लबालब भरा पानी और उस पर पड़ती सूरज की किरणें एक अद्भुत प्राकृतिक श्रृंगार की रचना कर रही हैं। सूने पड़े गांवों में फिर से वही पारंपरिक चहल-पहल लौट आई है। खेतों से आती ट्रैक्टरों की गूंज, आधुनिक कृषि यंत्रों की आवाजें, और कीचड़ (चिखला) में उतरकर लोकगीतों के बीच धान की रोपाई करतीं ग्रामीण महिलाएं—यह सब मिलकर छत्तीसगढ़ के जीवंत और समृद्ध लोकजीवन का एक ऐसा कोलाज बना रहे हैं, जिसे देखकर हर कोई सम्मोहित हो जाए। कहीं जुताई का आखिरी दौर चल रहा है, तो कहीं रोपाई का काम युद्धस्तर पर जारी है।
साय सरकार का ‘एडवांस मैनेजमेंट’: संकट से पहले ही तैयार था समाधान
इस मानसूनी खुशनुमा बदलाव के पीछे सिर्फ प्रकृति की इनायत नहीं है, बल्कि मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की प्रशासनिक दूरदर्शिता भी है। कृषि विभाग ने इस बार ‘मानसून पूर्व प्रबंधन’ नीति पर काम करते हुए बारिश की पहली बूंद गिरने से पहले ही प्रदेश के कोने-कोने में उच्च गुणवत्ता वाले बीज और रासायनिक व जैविक उर्वरकों (खाद) का पर्याप्त बफर स्टॉक तैयार कर दिया था। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि जैसे ही मौसम अनुकूल हुआ, किसानों को एक मिनट का भी समय गंवाना नहीं पड़ा।
सफलता की जमीनी हकीकत: कोरबा के करतला से सीधी रिपोर्ट
सरकारी दावों की असली और प्रामाणिक हकीकत कोरबा जिले की सहकारी समितियों में साफ देखी जा सकती है, जहां बिना किसी बिचौलिए और बिना किसी किल्लत के खाद-बीज सीधे किसानों के हाथों में पहुंच रहा है।

करतला स्थित आदिवासी सेवा सहकारी समिति में पहुंचे ग्राम कछार के मध्यम वर्गीय किसान श्री घनश्याम राठिया (कृषि भूमि- साढ़े छह एकड़) ने इस सुचारू व्यवस्था पर अपनी मुहर लगाई। उन्होंने बिना किसी झिझक के बताया:
“इस बार न तो लंबी लाइनों का मानसिक तनाव झेलना पड़ा और न ही खाद के लिए हफ्तों का इंतजार करना पड़ा। मुझे अपनी खेती के लिए आवश्यक 12 बोरी यूरिया, 6 बोरी डीएपी और 4 बोरी सुपर फास्फेट बेहद सहजता से मिल गया। शासन द्वारा दी जा रही सब्सिडी (अनुदान) के कारण खेती की लागत में बड़ी कमी आई है, जो हमारे जैसे किसानों के लिए संजीवनी की तरह है।”
विशेष संपादकीय टिप्पणी: “नीति और नियति का यह सुंदर समन्वय ही असली खुशहाली है”
छत्तीसगढ़ की सियासत और सरोकार हमेशा से धान, किसान और गांव के इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं। इस वर्ष की शुरुआत में मानसून की बेरुखी ने निश्चित रूप से डराया था, लेकिन आपदा को अवसर में बदलने की प्रशासनिक तैयारी पहले से पुख्ता थी।
अक्सर देखा जाता है कि अच्छी बारिश होने पर बाजारों में खाद-बीज की कृत्रिम किल्लत हो जाती है या कालाबाजारी पैर पसारने लगती है। परंतु, इस बार राज्य शासन का नियंत्रण और जिला प्रशासनों की कड़ाई ने बिचौलियों के हौसले पस्त कर दिए। घनश्याम राठिया जैसे छोटे-मझोले किसानों का यह संतोष यह साबित करता है कि जब ‘नीति’ (सरकार की मंशा) साफ हो और ‘नियति’ (मौसम) का साथ मिल जाए, तो पैदावार सिर्फ खेतों में नहीं, बल्कि किसानों के जीवन स्तर में भी होती है। समय पर उपलब्ध कृषि आदान और कुदरत की यह मेहरबानी इस खरीफ सीजन में छत्तीसगढ़ को रिकॉर्ड उत्पादन और ग्रामीण समृद्धि की एक नई ऊंचाई पर ले जाने का पुख्ता संकेत दे रही है।
