चूल्हे के धुएं से ‘टर्नओवर’ के आंकड़ों तक: छत्तीसगढ़ के GPM जिले में ग्रामीण महिलाओं ने रच दिया इतिहास

आधी आबादी का पूरा दम: बिहान मिशन के तहत लक्ष्य से पहले ही 9,095 दीदियां बनीं ‘लखपति’, गांवों में पुरुषों के एकाधिकार वाले बिजनेस मॉडल को किया ध्वस्त

विशेष ग्राउंड रिपोर्ट | रायपुर/गौरेला-पेंड्रा-मरवाही 7 जुलाई ।

छत्तीसगढ़ के जंगलों और पहाड़ों के बीच बसे एक शांत जिले से आर्थिक क्रांति की ऐसी गूंज उठी है, जिसने पूरे राज्य के नीति-निर्माताओं को चौंका दिया है। बात सिर्फ आंकड़ों की नहीं है, बात उस आत्मसम्मान की है जो घूंघट की ओट से निकलकर सीधे बैंक के केबिन तक जा पहुंचा है। छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के तहत संचालित ‘लखपति दीदी अभियान’ में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिले ने एक ऐसा बेंचमार्क सेट कर दिया है, जो देश के किसी भी विकसित राज्य के लिए मिसाल बन सकता है। जिले ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के खत्म होने से महीनों पहले ही अपने निर्धारित लक्ष्य का 90 प्रतिशत हासिल कर इतिहास रच दिया है।

​10,124 का था ‘चैलेंज’, 9 हजार से ज्यादा ने पार की ‘लखपति’ की दहलीज

​जब यह वित्तीय वर्ष शुरू हुआ था, तब GPM जिले को 10 हजार 124 ग्रामीण महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ (सालाना ₹1 लाख से अधिक की शुद्ध बचत) बनाने का कठिन लक्ष्य मिला था। कइयों को लगा था कि सुदूर वनांचल और आदिवासी बहुल इस इलाके में यह नामुमकिन होगा। लेकिन जिला प्रशासन और बिहान के मैदानी अमले ने ऐसा चक्रव्यूह रचा कि अब तक 9 हजार 095 महिलाएं लखपति बनने का गौरव हासिल कर चुकी हैं। यह सिर्फ एक सरकारी आंकड़ा नहीं, बल्कि 9 हजार से अधिक परिवारों के गरीबी रेखा से हमेशा के लिए बाहर आने का जीवंत दस्तावेज है।

​₹1.92 लाख का वो एक फैसला… जिसने बदल दी 6,010 समूहों की किस्मत

​जिले में इस समय 6 हजार 010 स्व-सहायता समूह (SHGs) किसी कॉर्पोरेट कंपनी की तरह काम कर रहे हैं। सरकार ने इन्हें प्रति समूह औसतन 1 लाख 92 हजार रुपये का ऋण देकर इनके पंखों को हवा दी। इसके बाद जो हुआ, उसने ग्रामीण अर्थशास्त्र की परिभाषा बदल दी:

सेक्टरपारंपरिक सोचदीदियों का नया अवतार (The Shift)
खेतीबाड़ीसिर्फ धान उगाना और मजदूरीड्रिप इरिगेशन से कैश क्रॉप (मशरूम, स्ट्रॉबेरी) और कड़कनाथ पालन
वनोपजकौड़ियों के भाव महुआ-इमली बेचनाब्रांडेड पैकेजिंग, वैल्यू एडिशन और सीधे बड़े शहरों में सप्लाई
तकनीकमोबाइल सिर्फ बात करने के लिए‘बैंक सखी’ बनकर गांवों में अंगूठे से करोड़ों का डिजिटल ट्रांजैक्शन

​”यह सिर्फ नोटों की गड्डी नहीं, उनके माथे का स्वाभिमान है”

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय का यह विजन अब छत्तीसगढ़ के गांवों में साफ दिखाई देता है। उनका संकल्प था कि महिलाएं केवल गृहस्थी के खर्चों के लिए पुरुषों पर निर्भर न रहें। आज बिहान योजना के माध्यम से दीदियों को कौशल, तकनीक, वित्तीय साक्षरता और सबसे बढ़कर ‘मार्केट लिंकेज’ दिया गया है। नतीजा? जो महिलाएं कभी बाजार जाने से कतराती थीं, वे आज बड़ी मंडियों में जाकर खुद अपनी शर्तों पर सौदेबाजी कर रही हैं।

​पैसा तो बाई-प्रोडक्ट है, असली बदलाव ‘लीडरशिप’ का है

​इस पूरी कामयाबी का सबसे दमदार पहलू यह है कि इसने गांवों का सामाजिक ढांचा बदल दिया है। इन 9 हजार से अधिक लखपति दीदियों में अब गजब का आत्मविश्वास है। वे घर के फैसले ले रही हैं, बच्चों को अच्छे स्कूलों में भेज रही हैं और गांवों की चौपालों पर नीतिगत चर्चाओं में हिस्सा ले रही हैं।

निष्कर्ष: GPM जिले की यह सफलता इस बात का तमाचा है उन ताकतों पर जो ग्रामीण भारत को पिछड़ा मानती हैं। इन दीदियों ने साबित कर दिया है कि अगर महिलाओं को सही संसाधन और सम्मान मिले, तो वे सिर्फ अपना घर नहीं, बल्कि पूरे ‘आत्मनिर्भर छत्तीसगढ़’ के भूगोल और भविष्य को बदलने की ताकत रखती हैं।

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