3 महीने का अग्रिम राशन लेकर जब घने जंगलों में गूंजी ट्रैक्टरों की घड़घड़ाहट, तो रो पड़े वनांचल के आदिवासी; मुख्यमंत्री के संकल्प को नारायणपुर प्रशासन ने बनाया हकीकत
विशेष ग्राउंड रिपोर्ट | रायपुर/नारायणपुर, 09 जुलाई।
यह महज़ सरकारी राशन बांटने की ख़बर नहीं है। यह कहानी है आदिम भूगोल पर इंसानी जज्बे और संवेदनशील सुशासन की महाविजय की! यह कहानी है बस्तर के उस अबूझमाड़ की, जहां मानसून आते ही आसमान से आफत बरसती है, नदियां रौद्र रूप धारण कर लेती हैं और इंसानी बस्तियां बाकी दुनिया से कटकर ‘कालापानी’ बन जाती हैं। लेकिन इस बार इतिहास बदल गया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के एक सिंगल आदेश—“भौगोलिक बाधाएं कितनी भी हों, मेरे राज्य के अंतिम व्यक्ति की थाली सूनी नहीं रहनी चाहिए”—ने समूचे प्रशासनिक तंत्र को देवदूत बना दिया।

नारायणपुर की जांबाज कलेक्टर नम्रता जैन के नेतृत्व में जिला प्रशासन ने वह कर दिखाया जो अब तक नामुमकिन माना जाता था। घने जंगलों, उफनते नदी-नालों, कीचड़ के दलदल और पहाड़ों को चीरते हुए मजबूत ट्रैक्टरों का एक विशेष कारवां उन अंदरूनी गांवों तक जा पहुंचा, जहां जाने की सोचकर भी रूह कांप जाती है। प्रशासन ने इन अति-दुर्गम गांवों के आदिवासियों के घरों में जुलाई, अगस्त और सितंबर यानी पूरे तीन महीने का राशन मानसून की पहली भारी बारिश से पहले ही सुरक्षित पहुंचा दिया है।

‘मिशन नारायणपुर’: 100 किलोमीटर का वो सफर, जहां मौत को मात देकर पहुंचे ‘अन्नदूत’
यह ऑपरेशन कितना खतरनाक था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिला मुख्यालय से 100 किलोमीटर दूर बसे छह गांव—मुरुमवाड़ा, गुडेकोर, दिवालूर, धोबे, बोटेर और हरबेल—पूरी तरह से घने जंगलों और पहाड़ों के बीच कैद हैं। मानसून में यहां पैदल चलना भी खुदकुशी जैसा है। लेकिन कलेक्टर के निर्देश पर खाद्य विभाग और स्थानीय अमले ने अपनी जान की परवाह न करते हुए, ट्रैक्टरों पर राशन लादा और उफनते नालों को पार कर ‘डोर-स्टेप डिलीवरी’ की ऐसी मिसाल पेश की, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है।
चूल्हा नहीं बुझेगा: 151 परिवारों के चेहरे पर लौटी मुस्कान
प्रशासन ने किसी डिजिटल औपचारिकता या कागजी चक्रव्यूह में आदिवासियों को नहीं फंसाया। स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में पूरी पारदर्शिता के साथ 151 राशनकार्डधारी परिवारों को उनका तीन महीने का हक एक साथ सौंप दिया गया:
| गांव का नाम | सुरक्षित हुए आदिम परिवार | प्रशासनिक मुस्तैदी का असर |
|---|---|---|
| मुरुमवाड़ा | 98 परिवार | अब बारिश में नहीं भटकना पड़ेगा |
| दिवालूर | 32 परिवार | घर की दहलीज पर पहुंचा अनाज |
| गुडेकोर | 13 परिवार | उफनते नालों के खौफ से मिली मुक्ति |
| धोबे | 03 परिवार | अंतिम छोर तक पहुंची सरकार |
| हरबेल | 03 परिवार | बुजुर्गों को मिला उनका अधिकार |
| बोटेर | 02 परिवार | दो परिवारों के लिए भी प्रशासन ने लांघा पहाड़ |
| कुल योग | 151 परिवार | भूख के खिलाफ सुशासन की जीत |
भावुक क्षण: “हमें लगा था भगवान भूल गया, पर सरकार आ गई!”
जब राशन से लदे ट्रैक्टर मुरुमवाड़ा और दिवालूर की सरहद पर पहुंचे, तो ग्रामीणों की आंखें छलक आईं। एक बुजुर्ग आदिवासी महिला ने ट्रैक्टर के पहियों को छूकर कहा— “बेटा, हर साल बारिश में हमें सिर्फ एक बोरी चावल के लिए जान हथेली पर रखकर उफनते नाले तैरकर पार करने पड़ते थे। कई बार भूखे पेट सोना पड़ता था। हमें लगा था इस घने जंगल में हमें भगवान भी भूल गया है, लेकिन आज हमारे घर के सामने राशन खड़ा है। साय सरकार हमारे लिए भगवान बनकर आई है।”
बुजुर्गों, महिलाओं और दिव्यांगों के लिए ‘संजीवनी’ बनी यह पहल
इस बार की रणनीति सिर्फ राशन फेंकने जैसी नहीं थी, बल्कि इसमें संवेदनशीलता घुली थी। मुख्यमंत्री के निर्देश पर ग्राम पंचायत स्तर पर दुकानें खोली गईं और जो बुजुर्ग या दिव्यांग वितरण केंद्र तक नहीं आ सकते थे, उनके कमरों तक राशन की बोरी पहुंचाई गई। ग्रामीणों का समय, श्रम और सबसे बढ़कर उनकी ‘जिंदगी’ इस एक फैसले से सुरक्षित हो गई।
विशेष संपादकीय टिप्पणी: ‘जब व्यवस्था संवेदनशील हो, तो भूगोल बौना हो जाता है’
दशकों से हमने फाइलों और चुनावी भाषणों में ‘अंतिम छोर के व्यक्ति का विकास’ जैसे जुमले सुने हैं। लेकिन नारायणपुर के जंगलों से आई यह तस्वीर बताती है कि जब सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति (मुख्यमंत्री विष्णु देव साय) जमीन से जुड़ा हो, तो नीतियां वातानुकूलित कमरों से निकलकर कीचड़ और जंगलों को चीरते हुए आदिवासियों की थाली तक पहुंचती हैं।
मात्र 2 परिवारों वाले गांव ‘बोटेर’ या 3 परिवारों वाले ‘धोबे’ और ‘हरबेल’ के लिए 100 किलोमीटर दूर ट्रैक्टरों का काफिला भेजना यह साबित करता है कि इस सरकार के लिए आंकड़ों से ज्यादा ‘इंसानी जान की कीमत’ है। नक्सलवाद और दुर्गम भूगोल के साये में जी रहे इन आदिवासियों के भीतर यह भरोसा जगाना कि ‘सरकार तुम्हारे साथ खड़ी है’, इस सदी की सबसे बड़ी प्रशासनिक और मानवीय सफलता है। नारायणपुर जिला प्रशासन और साय सरकार की यह ‘ट्रैक्टर क्रांति’ देश के हर उस राज्य के लिए एक केस स्टडी है, जो दुर्गम इलाकों में बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने का रोना रोते हैं। सलाम है इस जज्बे को!
– मुख्य ब्यूरो प्रमुख, छत्तीसगढ़ विशेष समाचार
