रायपुर/जगदलपुर, 14 जुलाई 2026
ब्यूरो रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित और सुदूर अंचलों में बदलाव की एक ऐसी मूक क्रांति आकार ले रही है, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पारंपरिक ढर्रे को बदल कर रख दिया है। बस्तर जिले के विकासखंड बकावंड की ग्राम पंचायत खोटलापाल से आई एक सफलता की कहानी इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी योजना “विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)” के तहत यहाँ निर्मित एक छोटी सी डबरी (तालाब) ने न केवल पानी के संकट को जड़ से उखाड़ फेंका है, बल्कि बस्तर के जंगलों के बीच समृद्धि का एक नया ‘ब्लूप्रिंट’ तैयार कर दिया है।

यह कहानी ग्राम खोटलापाल निवासी किसान श्री सोनधर की है, जिनकी बंजर होने की कगार पर खड़ी जमीन पर बनी इस डबरी ने आज पूरे क्षेत्र के लिए एकीकृत कृषि (Integrated Farming) की एक नई इबारत लिख दी है।
संकट से समृद्धि तक: जब बहते पानी ने रोकी तबाही
कुछ साल पहले तक बस्तर के अन्य पारंपरिक किसानों की तरह सोनधर का जीवन भी पूरी तरह मानसून की बेरुखी पर निर्भर था। चार महीने की बारिश का पानी ढलान से बहकर बर्बाद हो जाता था और अक्टूबर आते-आते खेतों में दरारें पड़ने लगती थीं। गर्मी के दिनों में तो स्थिति और भयावह हो जाती थी।
”पहले हम सिर्फ एक फसल के भरोसे थे, वह भी भगवान भरोसे। लेकिन ‘विकसित भारत मिशन’ के तहत जब मेरे खेत में डबरी का निर्माण हुआ, तो उसने मेरी किस्मत का पानी बदल दिया। अब मानसून का पानी बहता नहीं, बल्कि मेरी डबरी में संचित होकर भविष्य की फसलें उगाता है।”
— सोनधर, प्रगतिशील हितग्राही किसान
आज डबरी में जमा पानी के बूते सोनधर साल में दो नहीं, बल्कि तीन फसलें ले रहे हैं। धान के अलावा उनकी बाड़ी (सब्जी उत्पादन) और पशुपालन को इस डबरी से नया जीवन मिला है।
3-इन-1 मॉडल: सिंचाई, मछली पालन और अब बतख पालन से चौतरफा कमाई
यह डबरी सिर्फ एक तालाब नहीं, बल्कि सोनधर के परिवार के लिए ‘स्मार्ट एटीएम’ बन चुकी है, जिससे सालभर आय सुनिश्चित हो रही है:
- खेतों की प्यास बुझी: रबी और जायद फसलों के लिए चौबीसों घंटे पानी की उपलब्धता।
- नीली क्रांति (मछली पालन): डबरी में वैज्ञानिक तरीके से हो रहे मछली पालन ने सोनधर की सालाना आय को दोगुना कर दिया है।
- बतख पालन की तैयारी: आगामी महीनों में यहाँ बतख पालन शुरू करने का खाका तैयार है, जिससे खाद और अतिरिक्त आय दोनों एक साथ मिलेंगे।
एक डबरी, अनेक फायदे: पूरे गाँव को मिला ‘लाइफ सपोर्ट’
इस परियोजना की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसका असर सिर्फ सोनधर के खेत तक सीमित नहीं रहा। इसने पूरे खोटलापाल गाँव के पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) को बदल दिया है:
| विकास के पैमाने | जमीनी बदलाव और असर |
|---|---|
| वाटर टेबल में उछाल | डबरी के रीचार्ज सिस्टम के कारण आसपास के क्षेत्रों का भूजल स्तर अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है। गर्मी में सूखने वाले कुएं और हैंडपंप अब लबालब हैं। |
| मिट्टी में ‘जादुई’ नमी | जमीन के भीतर नमी (Soil Moisture) बनी रहने से पड़ोसी किसानों की फसलों की उत्पादकता में भी 20-30% का सुधार देखा गया है। |
| रोजगार का गढ़ | निर्माण के दौरान गाँव के जॉब कार्डधारी मजदूरों को घर के पास ही काम मिला, जिससे जेब में सीधा पैसा पहुँचा। |
| पलायन पर सर्जिकल स्ट्राइक | गाँव में ही रोजगार और कृषि के नए साधन मिलने से काम की तलाश में शहरों की ओर होने वाले पलायन पर प्रभावी रोक लगी है। |
आत्मनिर्भर बस्तर का नया चेहरा
खोटलापाल का यह सफल प्रयोग यह साबित करता है कि यदि सरकारी नीतियों को जनभागीदारी और सही नीयत के साथ जमीन पर उतारा जाए, तो जल संरक्षण के माध्यम से पर्यावरण, पर्यावरण से आजीविका और आजीविका से सीधे आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ सरकार का यह विजन बस्तर के आदिवासियों और किसानों के हाथों को मजबूत कर रहा है। सोनधर की यह डबरी आज केवल पानी सहेजने का साधन नहीं, बल्कि बस्तर के सुनहरे और आत्मनिर्भर भविष्य का चमकता हुआ आइना है।
