भगीरथ प्रयास: सरकारी योजना नहीं, अब यह जल-क्रांति है…

भगीरथ प्रयास: सरकारी योजना नहीं, अब यह जल-क्रांति है…

बालोद का ‘महा-संकल्प’: 2.85 लाख जल-मंदिरों से संवरेगा कल, धरती की प्यास बुझाने को जनता ने खुद उठाया कुदाल

असर: 19.23 लाख घनमीटर अतिरिक्त पानी सहेजने की क्षमता विकसित; अब ‘सूखा’ और ‘जल-संकट’ अतीत की बातें होंगी।

हुंकार: “जहाँ बरसे, जब बरसे, वहीं सहेजें”—शासकीय भवनों से लेकर खेतों की मेढ़ तक पानी रोकने की देश की सबसे बड़ी अनूठी मुहिम।

ताक़त: महिला कमांडो, ग्रीन आर्मी और युवाओं ने दागे 3 लाख बारूदी नहीं, बल्कि ‘हरियाली’ वाले सीड-बॉल; 2 लाख नए पौधों से सजेंगी पहाड़ियां।

विशेष खोजी ग्राउंड रिपोर्ट | रायपुर/बालोद, 14 जुलाई 2026

​यह कहानी सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि सूखी धरती का सीना चीरकर पानी की बूंद-बूंद को सहेजने के उस जज्बे की है, जिसने छत्तीसगढ़ के बालोद जिले को देश के नक्शे पर चमका दिया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के विज़न और उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा के कुशल मार्गदर्शन में शुरू हुआ ‘मोर गांव-मोर पानी’ महाअभियान अब कोई कागजी सरकारी योजना नहीं रह गया है। यह छत्तीसगढ़ का वह पहला ‘जल-जनआंदोलन’ बन चुका है, जिसने साबित कर दिया है कि अगर समाज ठान ले, तो सूखी नदियों और दम तोड़ते भूजल स्तर को दोबारा जिंदा किया जा सकता है।

​राज्य शासन की महात्वाकांक्षी ‘वीबीजी-रामजी योजना’ (विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन ग्रामीण) के तहत बालोद ने जल सुरक्षा और प्राकृतिक संपदा के प्रबंधन में जो कीर्तिमान रचा है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवनदायिनी साबित होगा।

अंक गणित: आंकड़े जो बदल रहे हैं बालोद की तक़दीर

​जिले में जनभागीदारी और श्रमदान का ऐसा सैलाब आया कि प्रशासन और जनता ने मिलकर 2.85 लाख जल संचयन संरचनाओं का या तो नए सिरे से निर्माण कर दिया या फिर दम तोड़ चुकी पुरानी संरचनाओं को नया जीवन दे दिया।

एक नजर में ‘जल-क्रांति’ के जादुई आंकड़े:

  • 2.85 लाख: कुल निर्मित व पुनर्जीवित जल संरचनाएं।
  • 19.23 लाख घनमीटर: इतनी अतिरिक्त जल संचयन क्षमता धरती के गर्भ में तैयार की गई।
  • 3.00 लाख: जुलाई के शुरुआती पखवाड़े में ही रोपे गए ‘सीड बॉल’।
  • 2.00 लाख: इस मानसून में नए पौधों को लगाने का महा-लक्ष्य।

​इस ऐतिहासिक कार्य से अब जिले का वॉटर टेबल (भूजल स्तर) तेजी से ऊपर आ रहा है। खेतों की मिट्टी अब पानी की कमी से नहीं फटेगी, बल्कि उसमें नमी बरकरार रहेगी। इसका सबसे बड़ा फायदा किसानों को मिलेगा, जो अब खरीफ के साथ-साथ रबी की फसलों के लिए भी निश्चिंत होकर खेतों में उतर सकेंगे।

‘कैच द रेन’ का असली सच: बेकार बोरवेल अब उगलेंगे पानी!

​”जहाँ वर्षा हो, जब वर्षा हो—वहीं वर्षा जल का संचयन हो।” इस मंत्र को बालोद ने अपनी आत्मा में बसा लिया है। जिले के हर एक सरकारी दफ्तर और स्कूल-कॉलेज की छतों पर रूफटॉप रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य कर दिया गया है।

​लेकिन, सबसे क्रांतिकारी काम हुआ है धरातल पर। गाँव-गाँव में जो बोरवेल सालों से बंद पड़े थे, दम तोड़ चुके थे, उन्हें ‘रिचार्ज शाफ्ट’ में बदलकर रिचार्जिंग पॉइंट बना दिया गया है। इसके अलावा डबरी, तालाबों के गहरीकरण, ट्रेंच (खाइयों) और सोख्ता गड्ढों के निर्माण से बहते हुए बरसाती पानी को बांध लिया गया है।

महिला कमांडो और ग्रीन आर्मी: जब आधी आबादी ने संभाली कमान

​इस महाअभियान की सबसे खूबसूरत तस्वीर इसकी जनभागीदारी है। सुबह होते ही गांवों में कुदाल, फावड़े और टोकरियां लेकर निकलने वाले इन ‘जल-योद्धाओं’ में सबसे आगे महिलाएं और युवा हैं।

  • महिला स्व-सहायता समूह और महिला कमांडो ने जल स्रोतों के संरक्षण को अपनी अस्मिता से जोड़ लिया है।
  • ग्रीन आर्मी और स्कूल-कॉलेज के छात्रों ने मिलकर तालाबों की सफाई को एक उत्सव बना दिया है।
  • ​सूखी पहाड़ियों और बंजर जमीनों पर हरियाली वापस लाने के लिए जुलाई के भीतर ही 3 लाख से अधिक सीड बॉल दागे गए हैं, जो पहली बारिश के साथ ही अंकुरित होकर आने वाले कल के घने जंगल बनेंगे।

रिपोर्ट कार्ड: किस जनपद ने जमीन पर क्या कर दिखाया?

​बालोद की अलग-अलग ग्राम पंचायतों में किस कदर युद्धस्तर पर काम हुआ है, यह इस बात का प्रमाण है:

1. गुरूर जनपद: जहां खाइयों को बनाया जल-सोर्स

  • अर्जुनी ग्राम पंचायत: यहाँ 1,200 विशेष ट्रेंच (खाइयां) खोदी गई हैं ताकि पहाड़ों से बहने वाला पानी सीधे जमीन में समा सके।
  • कुलिया ग्राम पंचायत: बंजर पड़े 1 हेक्टेयर क्षेत्र को मिश्रित फलोद्यान (फलों के बगीचे) में बदल दिया गया।
  • चंदनबिरही: गौठान के पास पानी को रोकने के लिए मजबूत सी.सी. चेकडैम का निर्माण।

2. गुंडरदेही जनपद: माइक्रो प्लानिंग की मिसाल

  • कोंगनी: 27,000 लीटर क्षमता का विशाल रिचार्ज पिट बनकर तैयार।
  • तवेरा: ग्रामीणों के पीने और सिंचाई के लिए 2.82 लाख लीटर क्षमता के विशाल कुएं का निर्माण।
  • माहुद (बी): 16 लाख लीटर पानी की विशाल क्षमता वाली आजीविका डबरी का निर्माण।
  • मुंदेरा व गब्दी: मुंदेरा में 30 हजार लीटर क्षमता का बोर रिचार्ज शाफ्ट और गब्दी में 5 KLD क्षमता का ग्रे-वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर पानी को दोबारा उपयोग के लायक बनाया जा रहा है।

3. डौंडी जनपद: निजी डबरियों से समृद्धि

  • सिंघनवाही: किसान के खेत में 12 लाख लीटर क्षमता की निजी आजीविका डबरी बनाई गई, जो खेती की किस्मत बदलेगी।
  • गुजरा: पहाड़ी और ढलान वाले रास्तों पर 35 लाख लीटर पानी रोकने के लिए 4,700 विशेष ट्रेंच बनाए गए।

संपादकीय टिप्पणी: ‘जल आत्मनिर्भरता’ का बालोद मॉडल

​”जल संरक्षण, जन सहभागिता से जल समृद्धि की ओर”—यह सिर्फ नारा नहीं, बालोद की नई पहचान है। जब कोई अभियान सरकारी दफ्तरों की फाइलों से निकलकर जनता के पसीने से सींचा जाता है, तो वह ‘भगीरथ प्रयास’ बन जाता है। बालोद के लोगों ने यह साबित कर दिया है कि प्रकृति को बचाने के लिए सरकारों के भरोसे नहीं, बल्कि अपनी माटी से प्रेम और सामूहिक संकल्प की जरूरत होती है। आज पूरा देश और प्रदेश बालोद के इस ‘वाटर मॉडल’ को सलाम कर रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *