- नारी शक्ति का शंखनाद: महतारी वंदन योजना की राशि से ग्रामीण महिलाओं ने संभाली बस्तर की सांस्कृतिक कमान
- परंपरा और प्रगति का संगम: गोंचा पर्व पर गूंजेगी चंदा के हाथों बनी ‘तुपकी’ की कड़क, घर में आएगी समृद्धि की नई बहार
- अब तक 29 किस्तों में ₹18,805 करोड़ से अधिक की सीधी मदद, चालू वित्तीय वर्ष में ₹8,200 करोड़ का भारी-भरकम बजट
विशेष खोजी रिपोर्ट
रायपुर/जगदलपुर, 15 जुलाई 2026
जब नीतियां सही नीयत से बनाई जाती हैं, तो वे सिर्फ फाइलों में दम नहीं तोड़तीं, बल्कि जमीन पर किसी गरीब के घर की तकदीर बदल देती हैं। छत्तीसगढ़ शासन की ‘महतारी वंदन योजना’ आज प्रदेश की आधी आबादी के लिए महज एक वित्तीय सहायता योजना नहीं, बल्कि स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का एक महा-आंदोलन बन चुकी है। इसका सबसे दमदार और जीवंत उदाहरण बस्तर के जंगलों और परंपराओं के बीच से निकलकर सामने आया है, जहां एक महिला ने सरकारी मदद को अपनी लोक-कला की ताकत बना लिया है।

जगदलपुर विकासखंड के सुदूर ग्राम मांझीगुड़ा की रहने वाली श्रीमती चंदा ने यह साबित कर दिया है कि अगर नारी को आर्थिक संबल मिले, तो वह न केवल अपने परिवार का पेट पाल सकती है, बल्कि अपनी सदियों पुरानी संस्कृति को भी नया जीवन दे सकती है।
जब परंपरा बनी आजीविका: क्या है बस्तर की ‘तुपकी’?
बस्तर का ऐतिहासिक गोंचा पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आदिम संस्कृति की आत्मा है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के दौरान यहां एक बेहद अनोखी परंपरा निभाई जाती है—‘तुपकी सलामी’।
सांस्कृतिक विरासत का अनोखा यंत्र
‘तुपकी’ बांस से तैयार किया जाने वाला एक पारंपरिक स्वदेशी यंत्र है। इसमें मलाग्नी वृक्ष के बीजों (पेंगू) को भरकर जब दागा जाता है, तो पटाखों जैसी कड़क और दमदार आवाज निकलती है। भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने के लिए हर बस्तरवासी के हाथ में गोंचा पर्व के दौरान यह तुपकी नजर आती है।
तंगहाली को दी शिकस्त: चंदा की सूझबूझ से बदला वक्त
एक समय था जब चंदा और उनके पति श्री चिगडू पैसों की तंगी के कारण इस त्योहार के सीजन में चाहकर भी बड़े पैमाने पर तुपकी का निर्माण नहीं कर पाते थे। कच्चे माल (बांस और अन्य सामग्री) को खरीदने के लिए उनके पास पूंजी नहीं होती थी।

लेकिन, महतारी वंदन योजना ने चंदा की जिंदगी का रुख बदल दिया:
- पूंजी का इंतजाम: हर महीने बैंक खाते में आने वाली तय राशि ने चंदा को साहूकारों के कर्ज से मुक्ति दिलाई।
- कुटीर उद्योग की शुरुआत: इस बार चंदा ने योजना के पैसों को घर के खर्च में उड़ाने के बजाय सीधे बिजनेस में इनवेस्ट किया। उन्होंने थोक में बांस खरीदा और अपने पूरे परिवार को इस पारंपरिक कार्य में जोड़ लिया।
- त्योहारी सीजन में बंपर मुनाफे की उम्मीद: गोंचा पर्व के दौरान बस्तर के बाजारों में लाखों तुपकियों की मांग होती है। चंदा द्वारा तैयार की जा रही भारी खेप इस बार उनके परिवार को एक बड़ी आर्थिक छलांग लगाने में मदद करेगी।
| योजना की ताकत: एक नजर में | प्रभाव और आंकड़े |
|---|---|
| कुल हस्तांतरित किस्तें | 29 किस्तें (निरंतरता का प्रमाण) |
| सीधे खातों में पहुंची राशि | ₹18,805 करोड़ से अधिक |
| इस वर्ष का विशेष बजट प्रावधान | ₹8,200 करोड़ (वित्तीय वर्ष 2026-27) |
| मुख्य प्रभाव | ग्रामीण बाजारों में लिक्विडिटी और महिला स्वरोजगार में तेजी |
संपादकीय दृष्टिकोण: संस्कृति और समृद्धि का यह छत्तीसगढ़ मॉडल है बेजोड़
चंदा की यह कहानी बस्तर के बदलते परिदृश्य की एक छोटी सी झलक है। महतारी वंदन योजना ने महिलाओं को ‘याचक’ से ‘उत्पादक’ बना दिया है। जब एक आदिवासी महिला अपनी परंपरा के औजार (तुपकी) को अपनी आर्थिक तरक्की का जरिया बनाती है, तो समझ जाना चाहिए कि विकास की धारा सही दिशा में बह रही है। यह समाचार बस्तर की बदलती तस्वीर, महिलाओं के बढ़ते हौसले और अपनी संस्कृति पर गर्व करने की एक शानदार दास्तान है।
