पोषण वाटिका, न्योता भोजन और ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान से मिली व्यवहारिक शिक्षा; मध्याह्न भोजन में अब घुलेगा ताजी और जैविक सब्जियों का स्वाद
विशेष संवाददाता 26 जुलाई | रायपुर/सूरजपुर
छत्तीसगढ़ में स्कूली शिक्षा को सिर्फ किताबी ज्ञान तक सीमित न रखकर, उसे पोषण, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक सहभागिता से जोड़ने की एक ऐतिहासिक और अनूठी मिसाल कायम हुई है। जिले के लगभग 500 प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में शनिवार को ‘बैगलेस डे’ (Bagless Day) के अवसर पर एक साथ ऐसा त्रिवेणी संगम देखने को मिला, जिसने पूरे प्रदेश के सामने नवाचार का एक अनुकरणीय मॉडल पेश कर दिया है।

कलेक्टर श्रीमती रेना जमील के कुशल मार्गदर्शन और दूरदर्शी सोच के तहत आयोजित इस विशाल जन-अभियान में बच्चों के चेहरों पर खुशी, हाथों में कुदाल और मन में पर्यावरण के प्रति अपार उत्साह दिखाई दिया।
किताबों का बोझ हटा, तो निखर उठे जीवनोपयोगी कौशल
शनिवार को जब बच्चे बिना बस्ते (School Bag) के विद्यालय पहुँचे, तो उनका स्वागत परंपरागत पढ़ाई के बजाय जीवन-मूल्यों से जुड़ी गतिविधियों से हुआ।

- पोषण वाटिका (Kitchen Garden): स्कूल परिसरों में विद्यार्थियों, शिक्षकों और ग्रामीणों ने मिलकर सेमी, लौकी, बरबट्टी, खीरा, तरोई जैसी मौसमी सब्जियों का रोपण किया।
- जैविक कृषि का व्यावहारिक पाठ: बच्चों को सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि जमीन पर उतरकर प्राकृतिक खेती, खाद और पौधों की देखरेख का व्यावहारिक अनुभव दिया गया।
- थाली में पोषण: इन वाटिकाओं में उगने वाली रसायन-मुक्त ताजी सब्जियाँ सीधे ‘प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना’ के तहत बनने वाले मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) में शामिल की जाएँगी, जिससे बच्चों को कुपोषण से मुक्ति मिलेगी।

‘न्योता भोजन’ में दिखी जन-सहभागिता और आत्मीयता
बैगलेस डे का एक और सबसे खूबसूरत पहलू ‘न्योता भोजन’ रहा। इस पहल के तहत समाजसेवियों, पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय ग्रामीणों ने बड़े चाव से हिस्सा लिया। कई विद्यालयों में बच्चों के लिए फल, मिठाइयाँ और अतिरिक्त पूरक पौष्टिक आहार का प्रबंध किया गया। ग्रामीणों ने बच्चों के साथ बैठकर भोजन किया, जिससे सामाजिक समरसता और सामुदायिक जुड़ाव की एक नई मिसाल पेश हुई।
‘एक पेड़ माँ के नाम’: हरियाली का संकल्प
पर्यावरण संरक्षण के संदेश को आत्मसात करते हुए “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान के तहत सैकड़ों पौधे रोपे गए। विद्यार्थियों ने न केवल पौधे लगाए, बल्कि उन्हें सहेजने और बड़ा करने का संकल्प भी लिया।अधिकारियों के बोल: प्रदेश के लिए प्रेरणा बना सूरजपुर मॉडल
“बैगलेस डे सिर्फ किताबों से मुक्ति का दिन नहीं है, बल्कि यह बच्चों को प्रकृति से जोड़ने, श्रम का सम्मान सिखाने और जीवनोपयोगी कौशल विकसित करने का सशक्त माध्यम है। सूरजपुर का यह मॉडल शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसहभागिता का एक अद्भुत उदाहरण है, जो पूरे प्रदेश को नई दिशा दिखाएगा।”
— श्रीमती लता बेक, जिला शिक्षा अधिकारी, सूरजपुरमुख्य आकर्षण एवं मुख्य बिंदु (Key Highlights)
पहल (Initiative) उद्देश्य एवं प्रभाव (Impact & Objective) 500 स्कूल, एक साथ अभियान पूरे जिले में एक साथ पोषण, पर्यावरण और शिक्षा का एकीकरण। जैविक पोषण वाटिका ताजी सब्जियों से बच्चों के मध्याह्न भोजन का पोषण स्तर बढ़ेगा। न्योता भोजन समाज के हर वर्ग को सरकारी स्कूलों से जोड़ने की पहल। प्रकृति से जुड़ना “एक पेड़ माँ के नाम” से बच्चों में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी। सूरजपुर जिले की यह पहल स्पष्ट करती है कि जब प्रशासनिक दृढ़ इच्छाशक्ति और जन-भागीदारी मिलती है, तो स्कूल केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि संस्कार, स्वास्थ्य और पर्यावरण का गढ़ बन जाते हैं।
