पंडवानी को विश्व पटल पर चमकाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने रायपुर एम्स पहुंचकर दी भावभीनी श्रद्धांजली

रायपुर, 5 जुलाई ।

छत्तीसगढ़ की माटी की अनमोल धरोहर और अपनी सिंहगर्जना से देश-दुनिया में पंडवानी की अमिट छाप छोड़ने वाली विश्वविख्यात लोक कलाकार, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का आज दुखद निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पूरे देश और विशेषकर छत्तीसगढ़ में शोक की लहर दौड़ गई है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने आज अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), रायपुर पहुंचकर डॉ. तीजन बाई के पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित किया और उन्हें अत्यंत भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

​इस दौरान मुख्यमंत्री ने शोकाकुल परिजनों से मुलाकात कर उन्हें ढांढस बंधाया और अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त कीं। मुख्यमंत्री के साथ शासन-प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी और कला जगत की प्रमुख हस्तियां भी एम्स पहुंची थीं।

तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया: मुख्यमंत्री

​श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद मीडिया से चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने बेहद भावुक शब्दों में कहा:

​”डॉ. तीजन बाई ने अपनी अद्वितीय कला-साधना, अद्भुत आंगिक अभिनय और विलक्षण प्रतिभा के दम पर पंडवानी जैसी क्षेत्रीय लोक विधा को विश्व पटल पर एक विशिष्ट और सम्मानजनक पहचान दिलाई। उन्होंने सात समंदर पार छत्तीसगढ़ की संस्कृति और अस्मिता का परचम लहराया। उनका जाना छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, कला जगत और हमारी सांस्कृतिक विरासत के लिए एक ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसे कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा।”

अंगारों पर चलकर तय किया ‘कपालिक शैली’ का सफर

​डॉ. तीजन बाई का जीवन संघर्ष और सफलता की एक अद्भुत मिसाल था। भिलाई के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई ने उस दौर में पंडवानी की ‘कपालिक शैली’ को अपनाया, जब महिलाओं का मंच पर आकर प्रदर्शन करना सामाजिक बंधनों के खिलाफ माना जाता था। तमाम सामाजिक विरोधों और झंझावातों को दरकिनार करते हुए, हाथ में तंबूरा थामे जब उन्होंने मंच पर महाभारत के प्रसंगों को जीवंत करना शुरू किया, तो देखने वाले दांतों तले उंगली दबा लेते थे। दुशासन वध हो या कीचक वध, उनके अभिनय की रौद्रता और आवाज का भारीपन दर्शकों को सीधे कुरुक्षेत्र के मैदान में ले जाता था।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कमाया नाम

​डॉ. तीजन बाई की ख्याति केवल छत्तीसगढ़ या भारत तक सीमित नहीं रही। उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, रूस, जर्मनी और अमेरिका सहित दर्जनों देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर विदेशी दर्शकों को भी झूमने पर मजबूर कर दिया। उनकी इसी अद्भुत कला-साधना के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा:

  • पद्म श्री (1987)
  • पद्म भूषण (2003)
  • पद्म विभूषण (2019)
  • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)

कला जगत में पसरा सन्नाटा

​डॉ. तीजन बाई के निधन पर कला जगत, राजनीतिक दलों के नेताओं और साहित्यकारों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। सभी का मानना है कि तीजन बाई छत्तीसगढ़ी संस्कृति की वो मशाल थीं, जिसकी रोशनी हमेशा भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी। एम्स रायपुर से उनके पार्थिव शरीर को उनके पैतृक निवास ले जाया गया, जहां राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके अंतिम दर्शन के लिए हजारों प्रशंसकों और कला प्रेमियों की भीड़ उमड़ पड़ी है।

​तंबूरे की वो खनक और ‘अरे रामा रामा…’ की वो बुलंद आवाज भले ही हमेशा के लिए शांत हो गई हो, लेकिन विश्व संस्कृति के इतिहास में डॉ. तीजन बाई का नाम हमेशा अमर रहेगा।

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