तंबूरे की थाप पर महाभारत रचती महानायिका: डॉ. तीजन बाई
– एक ऐसा नाम, जिसने लोक कला की रूढ़ियों को तोड़कर छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू को वैश्विक मंच पर अमर कर दिया।

1. परिचय: एक हुंकार, जो रोंगटे खड़े कर दे
जब वे मंच पर कदम रखती हैं, तो वक्त ठहर जाता है। हाथ में गूंजता तंबूरा, माथे पर बड़ी सी बिंदी, गले में मोतियों की माला और आंखों में एक अजीब सी बिजली। लेकिन जैसे ही उनके कंठ से महाभारत का कोई प्रसंग फूटता है, तो वे सिर्फ एक कलाकार नहीं रह जातीं—वे खुद एक इतिहास बन जाती हैं। जब वे भीम की हुंकार भरती हैं, तो पंडाल में बैठे हजारों दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह जादू है पद्मविभूषण डॉ. तीजन बाई का। एक ऐसा नाम, जिसने छत्तीसगढ़ की लोक विधा ‘पंडवानी’ को सिर्फ जीवित नहीं रखा, बल्कि उसे सात समंदर पार ले जाकर विश्व संस्कृति के ऊंचे पायदान पर बैठा दिया।
2. विद्रोह से जन्मी विरासत: जब समाज ने दुत्कारा, कला ने अपनाया
तीजन बाई की कहानी सिर्फ एक कलाकार की सफलता की कहानी नहीं है; यह सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ एक औरत के महासंग्राम की गाथा है। 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग के गनियारी गाँव के एक बेहद साधारण पारधी परिवार में जन्मी तीजन को बचपन में अपने नाना ब्रजलाल पारधी से महाभारत सुनने का चस्का लगा। लेकिन छत्तीसगढ़ के उस दौर के समाज में किसी महिला का मंच पर खड़े होकर, हाथ में तंबूरा लेकर पंडवानी गाना (कापालिक शैली) एक अक्षम्य अपराध माना जाता था।
समाज भड़क उठा। अपनों ने ही उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया, घर से निकाल दिया। एक मामूली झोपड़ी में रहकर, भूखे पेट सोकर भी तीजन ने हार नहीं मानी। उनका यह विद्रोह किसी अहंकार के कारण नहीं, बल्कि अपनी कला के प्रति अगाध, पवित्र प्रेम के कारण था। समाज उन्हें पत्थर मारता रहा, और वे उन पत्थरों को लांघकर अपने तंबूरे की तान को और पैना करती रहीं।
3. तंबूरा नहीं, वह तो गांडीव और गदा है!
पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ पर हमेशा से पुरुषों का एकाधिकार था। माना जाता था कि वीर रस की वह कड़क आवाज और रौद्र रूप कोई महिला प्रदर्शित नहीं कर सकती। तीजन बाई ने इस मिथक के परखच्चे उड़ा दिए।
मंच पर उनका साढ़े तीन हाथ का तंबूरा कोई साधारण वाद्य यंत्र नहीं रह जाता। वह पल भर में अर्जुन का ‘गांडीव धनुष’ बन जाता है, अगले ही पल भीम की ‘विशाल गदा’ का रूप ले लेता है, और कभी दुशासन की छाती चीरने वाला खंजर बन जाता है। उनकी गायकी में ‘करुण रस’ की नदी बहती है, तो ‘वीर रस’ का दावानल भी धधक उठता है। भाषा छत्तीसगढ़ी होती है, लेकिन भाव इतने सार्वभौमिक कि भाषा की दीवारें खुद-ब-खुद ढह जाती हैं।
तीजन बाई का कला-सफ़र: माटी से आकाश तक
[गनियारी का संघर्ष] ➔ [हबीब तनवीर की पारखी नजर] ➔
4. जब पेरिस झूम उठा: वैश्विक क्षितिज पर छत्तीसगढ़
तीजन बाई की अद्भुत कला को पहचान दी देश के महान रंगकर्मी हबीब तनवीर ने। इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास है। 1985 में जब वे ‘भारत महोत्सव’ के लिए पेरिस (फ्रांस) गईं, तो वहां के दर्शकों को छत्तीसगढ़ी का एक शब्द भी समझ नहीं आ रहा था। लेकिन जब तीजन बाई ने अभिनय और सुरों का सैलाब बहाया, तो पूरा पेरिस खड़े होकर तालियां बजाने पर मजबूर हो गया। इसके बाद रूस, ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी सहित दुनिया का कोई ऐसा कोना नहीं बचा, जहां इस छत्तीसगढ़ी विदुषी ने अपनी माटी का परचम न लहराया हो।
5. सम्मानों का एवरेस्ट: जो कला के आगे बौने हो गए
भारत सरकार और दुनिया की बड़ी संस्थाओं ने तीजन बाई के योगदान को सिर माथे पर लिया। वे भारत के तीनों सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों (पद्म पुरस्कारों) से सम्मानित होने वाली देश की चुनिंदा महानतम विभूतियों में शामिल हैं:
- पद्म श्री (1988): कला जगत में उनकी शुरुआती धाक की स्वीकृति।
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995): कला के प्रति उनकी निष्ठा को राष्ट्रीय नमन।
- पद्म भूषण (2003): कला को वैश्विक ऊंचाई देने का सम्मान।
- फुकुओका अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार (2018, जापान): एशियाई संस्कृति में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए।
- पद्म विभूषण (2019): देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान।
- डी.लिट् की उपाधि: बिलासपुर और खैरागढ़ विश्वविद्यालय द्वारा मानद डॉक्टरेट।
6. अमर रहेगी यह तान
आज तीजन बाई ढलती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों से जूझते हमारे बीच नहीं हैं।
वे सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवित प्रेरणापुंज है। तीजन बाई ने साबित किया कि अगर आपकी आवाज में सच्चाई हो, तो धूल से उठकर भी आसमान पर हुकूमत की जा सकती है। जब तक इस धरा पर महाभारत की कथा जिंदा रहेगी, तब तक तीजन बाई और उनके तंबूरे की गूंज अमर रहेगी। छत्तीसगढ़ की इस अदम्य चेतना को पूरे राष्ट्र का कोटि-कोटि नमन!
तीजन बाई ने धूल से उठकर आसमान तक का सफर तय करके यह दिखा दिया कि लोक कलाओं में वह सामर्थ्य है जो महलों के वैभव को भी बौना कर दे। वे हमारे समय की सांस्कृतिक महानायिका हैं। छत्तीसगढ़ की इस अदम्य चेतना और उनकी कला-साधना को हमारा शत-शत नमन। सरकार और समाज का अब यह सामूहिक दायित्व है कि तीजन बाई की इस विरासत की लौ को कभी मद्धम न पड़ने दिया जाए।
