महाभारत की ‘महाआवाज’ खामोश: पंचतत्व में विलीन हुईं पंडवानी की युगपुरुष पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई

तंबूरा छूटा, हुंकार थमी: गनियारी में पूरे राजकीय सम्मान के साथ हुआ अंतिम संस्कार, विदाई देने उमड़ा समूचा छत्तीसगढ़

रायपुर/दुर्ग, 5 जुलाई 2026

​छत्तीसगढ़ की माटी की वह ओजस्वी हुंकार, जिसने पेरिस से लेकर लंदन तक के मंचों को हिलाकर रख दिया था, रविवार को हमेशा के लिए शांत हो गई। अपनी कड़कती आवाज, रौद्र रूप और हाथ में तंबूरा लेकर महाभारत के पात्रों को जीवंत करने वाली विश्वविख्यात पंडवानी गायिका, ‘पद्म विभूषण’ डॉ. तीजन बाई को उनके पैतृक गांव गनियारी में पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। छत्तीसगढ़ शासन के निर्णय पर पुलिस बल ने हवा में गोलियां दागकर और मातमी धुन बजाकर देश की इस महान सांस्कृतिक धरोहर को अंतिम सलामी दी।

​जैसे ही उनके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी गई, वहां मौजूद हजारों प्रशंसकों, देश-विदेश से आए कलाकारों, साहित्यकारों और जनप्रतिनिधियों की आंखें फफक पड़ीं। गनियारी की हवाओं में बस एक ही नारा गूंज रहा था— “जब तक सूरज-चांद रहेगा, तीजन दाई का नाम रहेगा।”

​## रूढ़ियों की छाती पर पैर रखकर खड़ी की थी पंडवानी की सल्तनत

​तीजन बाई का जाना सिर्फ एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि लोककला के एक पूरे स्वर्णिम अध्याय का अवसान है। एक ऐसे दौर में जब छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में महिलाओं का घर से निकलना भी गुनाह माना जाता था, तीजन बाई ने समाज के तानों और बहिष्कार की परवाह न करते हुए हाथ में तंबूरा थामा।

कापालिक शैली की पहली महिला शेरनी

उन्होंने पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ (खड़े होकर प्रदर्शन करना) को चुना, जिसे तब सिर्फ पुरुषों का एकाधिकार माना जाता था। उन्होंने अपनी कला के दम पर न केवल समाज को झुकाया, बल्कि छत्तीसगढ़ी बोली और लोकसंस्कृति को सात समंदर पार अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।

​## मेडल कम पड़ गए, कद इतना बड़ा था

​झोपड़ी से निकलकर राष्ट्रपति भवन और वैश्विक मंचों तक का सफर तीजन बाई की कठोर साधना का गवाह है। भारतीय संस्कृति में उनके अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें देश के तीन शीर्ष नागरिक सम्मानों से नवाजा गया:

  • 1988: पद्मश्री (जब दुनिया ने उनकी कला का लोहा माना)
  • 2003: पद्मभूषण (सांस्कृतिक अस्मिता को नई ऊंचाई देने के लिए)
  • 2019: पद्म विभूषण (देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान)

​## जब मंच पर बनती थीं ‘भीम’, थर्रा उठते थे दर्शक

​अंतिम विदाई में पहुंचे बुजुर्ग कलाकारों ने याद किया कि तीजन बाई जब मंच पर हाथ में तंबूरा लेकर भीम का गदा घुमाती थीं या दुशासन वध का प्रसंग गाती थीं, तो दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते थे। उनकी आंखें लाल हो जाती थीं और उनकी आवाज में बिजली सी कड़क पैदा होती थी। विदेशी दर्शक जो छत्तीसगढ़ी का एक शब्द नहीं समझते थे, वे भी उनकी शारीरिक भाषा और ओज को देखकर खड़े होकर तालियां बजाने पर मजबूर हो जाते थे।

​### एक युग का अंत, पर विरासत अमर

​गनियारी में आयोजित इस गमगीन विदाई समारोह में उपस्थित जनसमूह और सरकार के प्रतिनिधियों ने नम आंखों से यह संकल्प लिया कि तीजन दाई ने पंडवानी की जो मशाल जलाई है, उसकी रोशनी को कभी मद्धम नहीं होने दिया जाएगा। तीजन बाई आज सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब-जब पंडवानी का तंबूरा खनकेगा, उनकी हुंकार इस माटी में हमेशा गूंजती रहेगी।

शोक की लहर: राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री सहित कला जगत की तमाम बड़ी हस्तियों ने डॉ. तीजन बाई के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे भारतीय लोक परंपरा की अपूरणीय क्षति बताया है।

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