अबूझमाड़ की वादियों में अब नक्सलियों की गोलियां नहीं, महकेगी कॉफी की खुशबू!

बस्तर में ऐतिहासिक आर्थिक क्रांति: लाल आतंक के सबसे अभेद्य गढ़ ‘अबूझमाड़’ को ‘कॉफी हब’ बनाने की तैयारी, जमीन पर उतरीं कलेक्टर नम्रता जैन

न्यूज फ्लैश:

  • बड़ा बदलाव: दशकों से भौगोलिक अलगाव और हिंसा झेल रहा अबूझमाड़ अब वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने की राह पर।
  • बस्तर का ‘ब्लैक गोल्ड’: भारतीय कॉफी बोर्ड और आईजीकेवी (IGKV) के वैज्ञानिकों ने माना—अबूझमाड़ की मिट्टी और दो-स्तरीय वन चंदवा (Forest Canopy) कॉफी के लिए ‘सुपर कल्टीवेशन जोन’।
  • मिशन मोड पर प्रशासन: नारायणपुर कलेक्टर ने तकनीकी टीम के साथ किया कुतुल, कच्छपाल, कोदलियार और तोके जैसे अति-संवेदनशील गांवों का दौरा; तैयार हो रही है नर्सरी।
  • चाय की भी सुगबुगाहट: कॉफी के साथ-साथ अबूझमाड़ के ऊंचे और ठंडे इलाकों में चाय की खेती के लिए भी बनेगा एक्शन प्लान।

विशेष खोजी रिपोर्ट | रायपुर/नारायणपुर

07 जुलाई 2026

​छत्तीसगढ़ का वह इलाका, जहां कभी सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच बारूद की गंध हवाओं में घुली रहती थी, अब वहां दुनिया की सबसे बेहतरीन ऑर्गेनिक कॉफी की भीनी-भीनी खुशबू महकने वाली है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार की ‘विकास से बदलाव’ की नीति के तहत, देश के सबसे दुर्गम और अबूझ कहे जाने वाले वन क्षेत्र ‘अबूझमाड़’ को भारत के नए कॉफी मानचित्र पर स्थापित करने की बेहद साहसिक और ऐतिहासिक शुरुआत हो चुकी है।

​नारायणपुर जिला प्रशासन और भारतीय कॉफी बोर्ड (Coffee Board of India) ने मिलकर बस्तर के इस अशांत अंचल में एक ऐसी आर्थिक क्रांति की नींव रख दी है, जो यहां के आदिवासियों की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल देगी।

कलेक्टर खुद पहुंचीं ‘ग्राउंड जीरो’: कुतुल और कच्छपाल में छिपी है समृद्धि

​इस अभूतपूर्व परियोजना को अमलीजामा पहनाने के लिए नारायणपुर की जिला कलेक्टर श्रीमती नम्रता जैन ने खुद कमान संभाली है। वे भारतीय कॉफी बोर्ड के शीर्ष कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की टीम के साथ अबूझमाड़ के उन सुदूर वन गांवों में पहुंचीं, जहां कभी प्रशासनिक अमले का पहुंचना भी बड़ी चुनौती माना जाता था।

​टीम ने कुतुल, कच्छपाल, कोदलियार, इराकभट्टी और तोके गांवों का सघन दौरा कर वहां की मिट्टी, तापमान, सालाना बारिश के आंकड़ों और समुद्र तल से ऊंचाई (Elevation) का वैज्ञानिक परीक्षण किया।

वैज्ञानिकों की हरी झंडी: बस्तर का ‘नेचुरल शेड’ कॉफी के लिए वरदान

​इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार तकनीकी बुलेटिन “कॉफी इन छत्तीसगढ़” के अनुसार, बस्तर का दरभा इलाका पहले ही कॉफी उत्पादन में अपनी ताकत दिखा चुका है। अब वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया है कि अबूझमाड़ की समृद्ध वन मिट्टी और यहां के ऊंचे-घने पेड़ों का ‘टू-टियर फॉरेस्ट कैनोपी’ (दो-स्तरीय छायादार परिदृश्य) कॉफी के नाजुक पौधों को कड़कड़ाती धूप और मौसम के थपेड़ों से बचाने के लिए दुनिया का सबसे आदर्श प्राकृतिक ढांचा है। यहां उगने वाली कॉफी पूरी तरह जैविक (ऑर्गेनिक) होगी, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारी मांग है।

“हम अबूझमाड़ के समृद्ध जंगलों और इसकी प्राकृतिक पारिस्थितिकी (Ecology) को बिना कोई नुकसान पहुंचाए विकास की नई इबारत लिख रहे हैं। कॉफी सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि इस क्षेत्र के आदिवासियों के लिए पीढ़ियों तक चलने वाला स्थायी रोजगार है। हम एक वैज्ञानिक और चरणबद्ध दृष्टिकोण अपना रहे हैं ताकि वन संपदा का संरक्षण भी हो और स्थानीय युवाओं व महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के हाथों को मजबूत काम भी मिले।”

श्रीमती नम्रता जैन, जिला कलेक्टर, नारायणपुर

रोजगार का महा-मॉडल: 4 साल बाद बरसेगा पैसा

​प्रशासनिक ब्लूप्रिंट के अनुसार, शुरुआती चरण में उपयुक्त जमीनों को चिन्हित कर उच्च स्तर की नर्सरी विकसित की जा रही है। रोपण के ठीक चार साल बाद कॉफी का व्यावसायिक उत्पादन (Commercial Production) शुरू हो जाएगा, जो आने वाले कई दशकों तक स्थानीय आदिवासियों को बंपर और निरंतर आय का जरिया देगा।

​इस पूरी मुहिम के केंद्र में स्थानीय ग्रामीण और महिला स्वयं सहायता समूह (SHGs) होंगे, जो नर्सरी प्रबंधन से लेकर फसल की कटाई और प्रोसेसिंग तक की कमान संभालेंगे।

ओडिशा में ट्रेनिंग और भविष्य में ‘चाय बागान’ का भी सपना

​इस मेगा प्रोजेक्ट को तकनीकी रूप से अचूक बनाने के लिए नारायणपुर के कृषि अधिकारियों की टीम को ओडिशा के कोरापुट स्थित कॉफी बोर्ड के क्षेत्रीय केंद्र में वैज्ञानिक प्रशिक्षण के लिए भेजा जा रहा है।

​यही नहीं, विशेषज्ञों के इस दौरे में अबूझमाड़ की वादियों में चाय की खेती की भी जबर्दस्त संभावनाएं सामने आई हैं। कलेक्टर ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि कॉफी के साथ-साथ भविष्य में चाय बागान विकसित करने के लिए भी एक विस्तृत एक्शन प्लान (Phase-wise Action Plan) तैयार रखा जाए।

विशेष टिप्पणी :

“बंदूक से बूम तक का सफर”

अबूझमाड़ में कॉफी और चाय की खेती की यह पहल सिर्फ एक कृषि नवाचार नहीं, बल्कि वामपंथी उग्रवाद की रीढ़ पर विकास का सबसे बड़ा प्रहार है। बंदूक की गूंज और डर के साये को पीछे छोड़कर जब बस्तर की आदिवासी महिलाएं दुनिया के सामने ‘अबूझमाड़ कॉफी’ का कप पेश करेंगी, तो वह भारत की आंतरिक सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सबसे शानदार और असरदार जीत होगी।

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