ढिबरी युग से सीधे डिजिटल युग में पहुंचे मोहन्दी और मसपुर; ‘नियद नेल्लानार’ योजना ने ढहाया बाधाओं का पहाड़, पहली बार जले बल्ब तो रो पड़े वनवासी।
📰 विशेष कवरेज: नारायणपुर/रायपुर
📅 12 जुलाई, 2026
नारायणपुर/रायपुर। यह सिर्फ बिजली के एक बल्ब का जलना नहीं है, यह बस्तर के उस माड़ (अबूझमाड़) के भाग्य का उदय है जिसे दशकों तक केवल ‘अंधेरे और आतंक’ के चश्मे से देखा गया। नारायणपुर जिले के सुदूर वनांचल में बसे ग्राम मोहन्दी और मसपुर के आदिवासियों के लिए साल 2026 की यह कड़कड़ाती गर्मियां इतिहास के पन्नों में अमर हो गईं। पीढ़ियों से लालटेन की मद्धम रोशनी और कड़वे तेल की ढिबरी के धुएं में अपनी जिंदगी खपा चुके इन आदिवासियों के घरों में जब पहली बार 220 वोल्ट का करंट दौड़ा और दूधिया रोशनी फैली, तो बरसों का सन्नाटा टूट गया। बूढ़ी आंखों से खुशी के आंसू बह निकले और बच्चों की किलकारियों से पूरा जंगल गूंज उठा।

राज्य सरकार की रणनीतिक और सबसे महत्वाकांक्षी ‘नियद नेल्लानार’ (आपका अच्छा गांव) योजना ने साबित कर दिया है कि अगर प्रशासनिक इरादे फौलादी हों, तो विकास की राह में घने जंगल, भौगोलिक दुर्गमता और बंदूकें भी रोड़ा नहीं बन सकतीं।
बारूद के साए पर भारी पड़ा ‘इंजीनियरों का हौसला’
घने अभयारण्य, आसमान छूती पहाड़ियां, उफनते नाले और सबसे बढ़कर सुरक्षा की गंभीर चुनौतियां… ग्राम मोहन्दी के मिचिंगपारा, कोडियारपारा व बीचपारा और ग्राम मसपुर के गुडरापारा तक बिजली के खंभे गाड़ना मौत के कुएं में उतरने जैसा था। यह वो इलाका है जहाँ परिंदा भी पर मारने से पहले सोचता है।
लेकिन, जिला प्रशासन के कड़े नेतृत्व में छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के जांबाज इंजीनियरों और निर्माण एजेंसी एम/एस माँ शारदा के मजदूरों ने इस नामुमकिन काम को मुमकिन कर दिखाया। जब सुरक्षा बलों के सुरक्षा घेरे में टीम ने घने जंगलों को चीरते हुए पहाड़ों पर लोहे के खंभे खड़े किए और तार खींचे, तो वह किसी युद्ध जीतने जैसा नजारा था। टीम ने न केवल इस चुनौती को स्वीकार किया, बल्कि समय-सीमा से पहले काम पूरा कर इतिहास रच दिया।
सरकार की ‘विकास नीति’: ₹84 लाख से बदला 45 परिवारों का मुकद्दर
सरकार ने बस्तर के इस अंतिम कोने तक रोशनी पहुंचाने के लिए तिजोरी का मुंह खोल दिया। इसे महज़ एक सरकारी खर्च नहीं, बल्कि आदिवासियों के आत्मसम्मान की बहाली के रूप में देखा जा रहा है:
| गांव/पारा का नाम | आवंटित बजट | लाभांवित आदिवासी परिवार |
|---|---|---|
| ग्राम मोहन्दी (मिचिंगपारा, कोडियारपारा, बीचपारा) | ₹61.79 लाख | 40 परिवार (पहली बार बिजली) |
| ग्राम मसपुर (गुडरापारा) | ₹22.42 लाख | 05 परिवार (पहली बार बिजली) |
| कुल निवेश | ₹84.21 लाख | 45 परिवार (सैकड़ों ग्रामीण) |
अब न रात को थमेगी पढ़ाई, न इलाज के लिए भटकना पड़ेगा
बिजली की इस महा-क्रांति से अब इन गांवों की किस्मत और शक्ल दोनों बदलने वाली हैं:
- लालटेन मुक्त शिक्षा: अब बस्तर के नौनिहालों का भविष्य अंधेरे में नहीं खोएगा। रात के वक्त भी बच्चे बिना किसी डर और परेशानी के पढ़ सकेंगे। यह रोशनी उनके लिए डॉक्टरों, इंजीनियरों और अफसरों की नई पौध तैयार करेगी।
- डिजिटल और आधुनिक बस्तर: मोबाइल कनेक्टिविटी, चार्जिंग, पंखे और टीवी के आने से ये गांव सीधे देश-दुनिया की मुख्यधारा से जुड़ गए हैं। जो ग्रामीण कल तक कटे हुए थे, वे अब दुनिया की हलचल देख सकेंगे।
- स्वास्थ्य के क्षेत्र में संजीवनी: अब इन इलाकों के उप-स्वास्थ्य केंद्रों में जीवन रक्षक दवाएं और वैक्सीन खराब नहीं होंगी। रात में आने वाले मरीजों का इलाज अब टॉर्च की रोशनी में नहीं, बल्कि आधुनिक लाइटों के नीचे सुरक्षित ढंग से होगा।
- आर्थिक आत्मनिर्भरता का शंखनाद: बिजली आते ही ग्रामीणों में स्वरोजगार की ललक जाग उठी है। सिलाई, कुटीर उद्योग, दोना-पत्तल निर्माण और लघु वनोपज के छोटे-छोटे प्रोसेसिंग प्लांट अब गांवों में ही लगेंगे। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और शहरों की तरफ पलायन रुकेगा।
”ये सरकार नहीं, भगवान का रूप है” — भावुक हुए ग्रामीण
”हमने तो पूरी जिंदगी अंधेरे में काट दी, जंगली जानवरों और जहरीले सांप-बिच्छुओं के साए में जिए। कभी नहीं सोचा था कि मरते दम तक अपने घर में ऐसा उजाला देखेंगे। हमारे बच्चों की जिंदगी संवर गई।”
— मंगू राम सलाम, ग्राम बुजुर्ग
वर्षों का सूखा खत्म होने पर ग्रामीणों ने बिजली के खंभों की पूजा की, दीए जलाए और पारंपरिक रेला नृत्य कर अपनी खुशी का इजहार किया। ग्रामीणों ने एक सुर में राज्य सरकार, कलेक्टर और बिजली विभाग के उन जांबाज कर्मचारियों का आभार माना जिन्होंने अपनी जान दांव पर लगाकर उनके घरों को रोशन किया।
✒️ संपादकीय टिप्पणी: अंधेरे पर उजाले की यह जीत केवल सांकेतिक नहीं है…
बस्तर का वास्तविक ‘सूर्योदय’
नारायणपुर के अबूझमाड़ क्षेत्र के मोहन्दी और मसपुर गांवों में बिजली पहुंचना केवल दो गांवों के विद्युतीकरण की सामान्य प्रशासनिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह देश के सबसे संवेदनशील और कठिन मोर्चे पर राज्य की उपस्थिति और उसकी ‘इच्छाशक्ति’ का एक जोरदार उद्घोष है। दशकों से नक्सलवाद की आड़ में विकास को रोकने की जो साज़िशें रची जाती रही हैं, ‘नियद नेल्लानार योजना’ ने उस पर सबसे करारा प्रहार किया है।
बंदूक की नाल से निकलने वाले भ्रम को बस्तर के भोले-भाले आदिवासियों ने हमेशा झेला है, लेकिन जब सरकार का हाथ बिजली के स्विच तक पहुंचता है, तो लोकतंत्र पर जनता का भरोसा कई गुना बढ़ जाता है। बुनियादी सुविधाएं जैसे बिजली, सड़क और पानी ही वे अचूक हथियार हैं जो किसी भी विचारधायिक भटकाव को जड़ से खत्म कर सकते हैं।
जिला प्रशासन और बिजली विभाग के मैदानी अमले की यह सफलता इसलिए भी सलाम के काबिल है क्योंकि इन्होंने जान जोखिम में डालकर घने जंगलों में लोहे के खंभे गाड़े हैं। हालांकि, असल चुनौती अभी शुरू होती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस बिजली की निरंतरता बनी रहे और इसके साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य तथा डिजिटल कनेक्टिविटी के अन्य आयाम भी तुरंत इन गांवों तक पहुंचें। बस्तर के हर ‘माड़’ को जब तक ऐसा उजाला नहीं मिलता, तब तक विकास का यह संकल्प अधूरा है। लेकिन, शुरुआत बेहद शानदार और असरदार है।
