बंदूक छोड़ पकड़ी ‘बढ़ती खुशहाली’ की राह: सुकमा के 25 युवाओं ने खेतों में बोए आत्मनिर्भरता के बीज

विशेष रिपोर्ट: कृषि विज्ञान केंद्र के 15 दिवसीय प्रशिक्षण ने बदली आत्मसमर्पित युवाओं की तकदीर; अब प्राकृतिक खेती, पशुपालन और मशरूम उत्पादन से गढ़ेंगे नया भविष्य

रायपुर/सुकमा, 19 जुलाई 2026
कल तक जिनके हाथों में नफरत और हिंसा की बंदूकें हुआ करती थीं, आज उन्हीं हाथों में मिट्टी की खुशबू, फसलों की हरियाली और आत्मनिर्भरता का संकल्प है। बस्तर के सुकमा जिले में समाज की मुख्यधारा से भटके 25 युवाओं ने हिंसा का रास्ता पूरी तरह छोड़कर विकास की राह पर कदम बढ़ा दिए हैं। सुकमा जिला प्रशासन, कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) की एक साझा व अनूठी पहल ने इन आत्मसमर्पित युवाओं के जीवन को एक नया और सम्मानजनक आधार दे दिया है।
हाल ही में संपन्न हुए 15 दिवसीय विशेष कौशल विकास प्रशिक्षण ने इन युवाओं की सोच और तकदीर दोनों को बदल कर रख दिया है। अब ये युवा अपनी नई पहचान एक ‘सफल और आधुनिक किसान’ के रूप में बनाने के लिए तैयार हैं।

22 जून से 14 जुलाई: बदलाव के 15 ऐतिहासिक दिन

सुकमा जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में आयोजित यह विशेष प्रशिक्षण शिविर महज एक सरकारी औपचारिकता नहीं, बल्कि पुनर्वास की एक जीवंत मिसाल बना। 22 जून से 14 जुलाई 2026 तक चले इस सघन प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य इन युवाओं को समाज की मुख्यधारा में पूरी गरिमा के साथ वापस लाना था।
कृषि विशेषज्ञों ने युवाओं को न केवल खेती-किसानी के गुर सिखाए, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए विभिन्न कृषि-आधारित व्यवसायों का व्यावहारिक (प्रैक्टिकल) प्रशिक्षण भी दिया।

सीखे आधुनिक और पारंपरिक खेती के नायाब नुस्खे

प्रशिक्षण के दौरान युवाओं ने बेहद उत्साह के साथ टिकाऊ और कम लागत वाली खेती की बारीकियों को समझा। उन्हें सिखाया गया कि कैसे बिना रासायनिक खादों के भी बंपर पैदावार ली जा सकती है।

  • प्राकृतिक अमृत का निर्माण: विशेषज्ञों की देखरेख में युवाओं ने बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र, हांडी दवा, थ्री-जी दवा और मछली टॉनिक जैसी जैविक दवाएं और खाद खुद अपने हाथों से तैयार करना सीखा।
  • आधुनिक तकनीकें: युवाओं को नाडेप खाद, वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद), और हरी खाद बनाने की विधि सिखाई गई। इसके अलावा सब्जी नर्सरी तैयार करने, फलदार पौधों के रोपण, धान की कतारबद्ध बुवाई, नीलहरित काई उत्पादन और गर्मी में खेतों की गहरी जुताई के फायदों से अवगत कराया गया।

सिर्फ खेती ही नहीं, स्वरोजगार के बहुआयामी विकल्प

बदलाव की इस बयार को और मजबूत करने के लिए प्रशिक्षण में बहुआयामी आजीविका मॉडल्स को शामिल किया गया था, ताकि युवा सालभर कमाई कर सकें:

  1. पशुपालन: बकरी पालन और उन्नत मुर्गी पालन की बारीकियां, जिससे कम समय में अच्छा मुनाफा कमाया जा सके।
  2. मत्स्य पालन: तालाबों के सही प्रबंधन और मछली पालन की आधुनिक विधाएं।
  3. ऑयस्टर मशरूम उत्पादन: घर के एक छोटे से हिस्से से शुरू होने वाले इस व्यवसाय के जरिए सीधे और त्वरित लाभ कमाने का जरिया।

दंतेवाड़ा का अध्ययन भ्रमण: जब प्रत्यक्ष देखा, तो बढ़ा हौसला

प्रशिक्षण को केवल थ्योरी तक सीमित नहीं रखा गया। युवाओं को जमीनी हकीकत दिखाने के लिए दंतेवाड़ा जिले का अध्ययन भ्रमण (एक्सपोजर विजिट) कराया गया। युवाओं ने मैलावाड़ा में धान की सुप्रसिद्ध एसआरआई (SRI) पद्धति और भूमगादी में चल रही प्राकृतिक खेती के सफल मॉडल्स को लाइव देखा। सफल किसानों से बातचीत कर इन युवाओं का हौसला दोगुना हो गया कि वे भी अपने गांवों में ऐसा चमत्कार कर सकते हैं।

‘अब खेती ही हमारी नई पहचान’ – अधिकारी व वैज्ञानिक

समापन के भावुक और गरिमामयी अवसर पर उप संचालक कृषि श्री पी.आर. बघेल, सहायक संचालक कृषि श्री सुधीर कुजूर और कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख श्री एच.एस. तोमर सहित कई कृषि वैज्ञानिकों ने प्रशिक्षणार्थियों की पीठ थपथपाई।
अधिकारियों ने साझा संदेश में कहा:
“कृषि और पशुपालन हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इन युवाओं ने जो हुनर सीखा है, वह न केवल इनके परिवारों को आर्थिक तंगी से उबारेगा, बल्कि समाज में इन्हें एक प्रतिष्ठित स्थान दिलाएगा। बंदूक से सिर्फ विनाश होता है, लेकिन हल से पूरे समाज का पेट भरता है।”

संकल्प: ‘सम्मान की जिंदगी जिएंगे’

शिविर से निकले युवाओं की आंखों में अब एक नया सपना और चेहरे पर आत्मविश्वास है। प्रशिक्षणार्थियों ने एक सुर में कहा, “हमें यहां आकर महसूस हुआ कि असली जिंदगी क्या होती है। अब हम अपने गांवों में जाकर इन तकनीकों का इस्तेमाल करेंगे, खुद का रोजगार खड़ा करेंगे और समाज के सामने एक मिसाल पेश करेंगे। हम आत्मनिर्भर बनेंगे और सम्मान की जिंदगी जिएंगे।”
संपादकीय टिप्पणी:
सुकमा का यह प्रयोग पूरे बस्तर संभाग के लिए एक लाइटहाउस (प्रकाश स्तंभ) की तरह है। यह कहानी साबित करती है कि अगर सही दिशा, सही कौशल और सहृदयता से युवाओं को थामा जाए, तो नक्सलवाद के घने अंधेरे को विकास की रोशनी से पूरी तरह मिटाया जा सकता है।

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